272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
को कहा। तब स्वयं अपने हाथों से भिक्षु के शरीर को धोया और उसके रोग
की देखभाल की।
- उस समय पृथ्वी काँपी और वह सम्पूर्ण स्थान अलौकिक प्रकाश से भर उठा,
जिससे कि राजा और मंत्री, तथा सभी आकाश-स्थित देवता, नाग इत्यादि उस
स्थान पर एकत्रित हो गये। और भगवान बुद्ध की आराधना की। 15. वहाँ एकत्रित उन सभी को आश्चर्य हुआ, उन्होंने विश्व-पूजनीय तथागत को
संबोधित किया और पूछा कि, ‘‘इतने महान होकर आप इतना सामान्य काम कैसे
और क्यों कर सके?’’ जिस पर भगवान बुद्ध ने इस विषय को समझाया। 16. ‘‘संसार में तथागत के आने का उद्देश्य ही यह है कि जो दरिद्र, असहाय और
अनारक्षित हैं उनको मित्र बनाना, जो शारीरिक कष्ट में हैं उनकी सेवा करना,
भले ही वे श्रमण हों या किसी अन्य धर्म के अनुयायी हों-कंगाल, अनाथ और
वृद्धों की सहायता करना, तथा दूसरों को ऐसा करने के लिये प्रेरित करना।’’
3. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा दे कि करुणा
से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है
भगवान बुद्ध करुणा की शिक्षा देकर ही नहीं रुके।
करुणा केवल मानव मात्र के प्रति प्रेम है। भगवान बुद्ध इससे भी आगे गये
और उन्होंने मैत्री की शिक्षा दी। मैत्री प्राणी-मात्र के प्रति प्रेम है। 3. भगवान बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य करुणा पर ही न रुक जाये, बल्कि मनुष्यता से
भी आगे जाये और सभी प्राणी-मात्र के प्रति मैत्री की भावना को पोषित करे। 4. यह उन्होंने बहुत अच्छी तरह एक सुत्त में स्पष्ट किया है, जब तथागत श्रावस्ती
में ठहरे हुए थे।
मैत्री के विषय में बोलते हुए, तथागत ने भिक्षुओं से कहाः
‘‘मान लो एक मनुष्य पृथ्वी खोदने आता है। क्या पृथ्वी विरोध करती है?’’
‘‘नहीं, भगवन्!’’ भिक्षुओं ने उत्तर दिया।
‘‘मान लो एक मनुष्य लाख और रंग लेकर आकाश में चित्र बनाना चाहता है।
क्या तुम समझते हो वह ऐसा कर सकेगा?’’
‘‘नहीं, भगवन्!’’
‘‘क्यों?’’, ‘‘क्योंकि आकाश में कोई कालापन नहीं हैं।’’, भिक्षुओं ने कहा।