3. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा देता है कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है। - Page 302

273

  1. ‘‘इसी प्रकार से तुम्हाने मन में भी काले धब्बे नहीं होने चाहिये, जो तुम्हारे बुरे

मनोविकारों के प्रतिबिम्ब हों।’’

  1. ‘‘मान लो कोई एक जलती हुई मशाल लेकर गंगा नदी में आग लगाने के लिये

आता है, तो क्या वह ऐसा कर सकता है?’’

  1. ‘‘नहीं, भगवन!’’

  2. ‘‘क्यों? क्योंकि गंगा नदी के जल में कोई जलने का गुण नहीं है।

  3. अपना उपदेश समाप्त करते हुए, तथागत ने कहा, ‘‘ठीक जिस प्रकार पृथ्वी

आघात अनुभव नहीं करती और विरोध नहीं करती, जैसे हवा के विरुद्ध किसी

प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होती, जैसे गंगा नदी का जल अग्नि से अप्रभावित हो

कर बहता रहता है, इसी प्रकार भिक्षुओ! तुम्हारे प्रति किये गये सभी अपमानों

और अन्यायों को तुम भी सहन कर लो और उन अपराधियों के प्रति मैत्री की

धारणा करते रहो।’’

  1. ‘‘अतः भिक्षुओ! मैत्री की धारा हमेशा बहती रहनी चाहिये। अपने चित्त को पृथ्वी

के समान दृढ़, वायु के समान स्वच्छ और गंगा नदी के समान शीतल बनाये रखना

और पवित्र कर्त्तव्य बना लो। यदि तुम मैत्री का अभ्यास रखोगे, तो कोई चाहे

कितना भी अरुचिकर व्यवहार करे, उसके द्वारा तुम्हारा चित्त सरलता से विचलित

नहीं होगा, क्योंकि वे सभी जो हानि पहुँचाते हैं, शीघ्र ही थक जायेंगे।’’

  1. ‘‘अपनी मैत्री के विस्तार को इतना असीम होने दो जैसे संसार और अपने

विचार को इतना व्यापक और अपरिमित होने दो, जिसमें कहीं घृणा के विषय

में सोचा भी न जा सके।’’

  1. ‘‘मेरे धम्म के अनुसार, करुणा का ही पालन करना पर्याप्त नहीं है। मैत्री का

पालन करना भी आवश्यक है।’’

  1. अपने उपदेश के दौरान तथागत ने भिक्षुओं को एक कथा सुनाई, जो याद रखने

योग्य है।

  1. ‘‘एक समय की बात है श्रावस्ती में विदेसिका नामक एक सम्पन्न स्त्री रहती थी,

जिसके सौम्य, सुशील और शान्त के रूप में ख्याति थी। काली नामक उसकी

एक नौकरानी थी, जो एक दक्ष लड़की, बहुत सुबह जागने वाली और अच्छा

कार्य करने वाली थी। काली ने सोचा मुझे आश्चर्य है कि क्या मेरी मालकिन

को, जो इतनी सुभाषित है, वास्तव में क्रोध आता ही नहीं या वह अपना क्रोध

प्रकट नहीं करती? या मैं अपना कार्य इतनी अच्छी तरह से करती हूँ, कि यद्यपि

उनमें क्रोध है, लेकिन वह इसे दर्शाती नहीं? मैं उनको परीक्षा लूंगी।’’