3. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा देता है कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है। - Page 303

274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘अतः अगली सुबह वह देर से उठी। ‘काली! काली!’ मालकिन चिल्लायी।

‘हाँ, मालकिन’, लड़की ने उत्तर दिया। ‘तू इतनी देर से क्यों उठी?’ ‘ओह,

ऐसा कुछ भी नहीं है, मालकिन!’ ‘शरारती लड़की! कहती है कुछ बात नहीं।

क्रोध और अप्रसन्नता से भौंहें चढ़ाते हुए मालकिन ने कहा।’’

  1. ‘‘अतः उनमें क्रोध है, यद्यपि वह इसे दर्शाती नहीं हैं, नौकरानी ने सोचाः ‘यह

है क्योंकि मैं अपना कार्य इतनी अच्छी तरह करती हूँ इसलिए इसका क्रोध

अप्रकट रहता है। मैं उन्हें और अधिक परीक्षा लूंगी।’ अतः वह अगली सुबह

और देर से उठी। ‘काली! काली’! मालकिन चिल्लायी। ‘हाँ, मालकिन! ‘लड़की

ने उत्तर दिया। ‘‘तुम इतनी देर करके क्यों उठी?’’ ओह ऐसा कुछ नहीं हैं,

‘मालकिन’! दुष्ट लड़की कहती है कुछ बात नहीं, अपने क्रोध और अप्रसन्नता

को शब्दों में अभिव्यक्त करते हुए मालकिन चिल्लाई।’’

  1. ‘‘नौकरानी ने सोचा, ‘हाँ,’ उनमें क्रोध तो निश्चित है, यद्यपि वे इसे दर्शाती

नहीं हैं, क्योंकि मैं अपना कार्य इतनी अच्छी तरह करती हूँ, मैं उन्हें और भी

अधिक परीक्षा लूंगी, अतः अगली सुबह वह और भी अधिक देर से उठी।

‘काली! काली! मालकिन चिल्लायी।’ ‘हाँ, मालकिन!’ लड़की ने उत्तर दिया।

‘तू इतनी देर से क्यों उठी?’ ओह, ऐसी कुछ बात नहीं है, मालकिन!’’

  1. ‘इतनी देर में उठती है दुष्ट लड़की! और कहती है कुछ बात नहीं’ मालकिन

चिल्लायी और अपने क्रोध और अप्रसन्नता में उसने दरवाजे की सांकल उठायी

और उस लड़की के सिर में दे मारी जिससे खून बहने लगा।’’

  1. ‘‘अपने फूटे हुए सिर जिससे खून बह रहा था, को लेकर काली ने चीखों से

पड़ोसियों को जगा दिया, ‘देखो! मालकिन ने क्या किया है! देखो रे लोगो!

सुशील स्त्री ने क्या किया है। देखो! स्त्रियो, शान्त स्त्री ने क्या किया है। वह

भी किसलिये? केवल इसलिये कि उनकी एकमात्र नौकरानी देर से उठी, वे

इतनी क्रोधित और अप्रसन्न थी कि दरवाजे की सांकल लेकर मेरे सिर पर

मारने और उसे फोड़ने के लिए बस कूद पड़ी।’’

  1. ‘‘परिणामस्वरूप स्त्री विदेसिका सुशील और शान्त की बजाए बड़ी अशान्त और

बड़े क्रोधी स्वभाव के रूप में मशहूर हो गई।’’

  1. ‘‘इसी तरह कोई भिक्षु पर्याप्त विनम्र और सुशील और शान्त हो सकता है, जब

तक कि उसके विरुद्ध कुछ अरुचिकर नहीं कहा जाए। यह तो केवल तभी

ज्ञात हो सकता है, जब आप परीक्षा लें, जब उसके विरुद्ध अरूचिकर बातें

कही जायें कि उसके भीतर मैत्री की भावना है कि नहीं।’’