3. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा देता है कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है। - Page 304

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  1. तब उन्होंने आगे कहा, ‘‘मैं उस भिक्षु को मैत्री-भाव-सम्पन्न नहीं कहता, जो

केवल वस्त्र और भोजन प्राप्त करने के लिये मैत्री को दर्शाता है। मैं केवल

उसी को सच्चा भिक्षु कहता हूँ, जिसकी मैत्री धम्म से उत्पन्न होती है।’’

  1. ‘‘हे भिक्षुओ! कोई भी धार्मिक पुण्य अर्जित करने के लिये अपनाया गया उपाय,

मैत्री-भावना के सोलहवें भाग के बराबर नहीं है। मैत्री, जो चित्त की विमुक्ति

है, उन सभी को आत्मसात कर लेती है_ जो प्रकाशमान हैं, जो प्रदीप्त हैं, जो

प्रज्ज्वलित हैं।’’

  1. ‘‘इसी तरह से हे भिक्षुओ! जिस प्रकार सभी तारों का प्रकाश चन्द्रमा के प्रकाश

के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है, किन्तु चन्द्रमा उसको आत्मसात कर

लेता है और प्रकाशमान होता है, प्रदीप्त होता है, प्रज्ज्वलित होता है, उसी तरह

से, हे भिक्षुओ! धार्मिक पुण्य अर्जित करने के लिये अपनाया गया कोई भी

उपाय मैत्री-भावना के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है। मैत्री, जो कि चित्त

की विमुक्ति है, उन्हें आत्मसात कर लेती है_ जो प्रकाशमान है, जो प्रदीप्त हैं,

जो प्रज्ज्वलित है।’’

  1. ‘‘और उसी तरह से, हे भिक्षुओ! जिस तरह वर्षा ऋतु की समाप्ति पर, सूर्य,

स्वच्छ और बादल रहित आकाश में उदय होते हुए, सभी अन्धकार को निर्वासित

कर देता है और प्रकाशमान होता है, प्रदीप्त होता है, और प्रज्ज्वलित होता है

और पुनः उसी तरह से जैसे रात्रि की समाप्ति पर भोर का तारा प्रकाशमान

होता है, प्रदीप्त होता है और प्रज्ज्वलित होता है, ठीक उसी प्रकार हे भिक्षुओ!

धार्मिक पुण्य अर्जित करने के लिये अपनाया गया कोई भी उपाय मैत्री-भावना

के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है। मैत्री, जोकि चित्त की विमुक्ति है,

उन्हें आत्मसात कर लेती है, जो प्रकाशमान होती है, जो प्रदीप्त होती है और

प्रज्ज्वलित होती है।’’