276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
परिच्छेद-चार
धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह समस्त सामाजिक
(भेद-भावों के) प्रतिबन्ध को मिटा दे
1. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह मनुष्य-मनुष्य के बीच के
अवरोधों (दीवारों) को गिरा दे
- एक ‘आदर्श-समाज’ क्या है? ब्राह्मणों के अनुसार वेदों ने आदर्श-समाज को
परिभाषित किया है कि एक आदर्श-समाज क्या है और वेद भ्रम या गलती से
परे होने से, उसी में वर्णित एकमात्र आदर्श-समाज है जिसे मनुष्य स्वीकार कर
सकता है।
- वेदों द्वारा प्रतिपादित आदर्श-समाज चातुर्वर्ण्य नाम से जाना जाता है।
- वेदों के अनुसार ऐसे एक समाज में तीन शर्तें अवश्य पूरी करनी चाहियें।
- यह चार वर्गों में निर्मित होना चाहिए-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
- इन वर्गों के परस्पर संबंध क्रमिक असमानता के सिद्धांत द्वारा नियंत्रित होने चाहियें।
दूसरे शब्दों में, ये सभी वर्ग समान स्तर पर नहीं हो सकते, बल्कि एक-दूसरे
के ऊपर-नीचे होने चाहियें, सामाजिक स्तर और अधिकारों एवं सुविधाओं के
विषय में।
- ब्राह्मण सबसे ऊपर पर रखे गये थे_ क्षत्रिय ब्राह्मणों से नीचे किन्तु वैश्य से
ऊपर, वैश्य क्षत्रियों से नीचे किन्तु शूद्रों से ऊपर और शूद्र सबसे नीचे रखे गये
थे।
- चातुर्वर्ण का तीसरा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य यह था कि प्रत्येक वर्ग को अपने-अपने
पेशे में लगा रहना होगा। ब्राह्मणों का व्यवसाय पढ़ना-पढ़ाना और धार्मिक
अनुष्ठानों के कार्य करना था। क्षत्रियों का पेशा शस्त्र धारण करना और युद्ध
करना था। वैश्यों का पेशा व्यापार और व्यवसाय था। शूद्रों का पेशा तीनों वर्गों
की दासोचित सेवा करना था।
- कोई भी वर्ग दूसरे वर्गों के पेशे का अतिक्रमण और अनाधिकार हस्तक्षेप नहीं
कर सकता है।
- एक आदर्श-समाज का यह सिद्धांत ब्राह्मणों द्वारा अनुमोदित था और लोगों में
प्रचारित किया गया था।
- यह स्पष्ट ही है कि इस सिद्धांत की ‘आत्मा’ ही असमानता है। यह सामाजिक