278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘जहाँ तक नैतिक उन्नति की सम्भावना है, क्या इस राष्ट्र के केवल ब्राह्मण
ही अपने मत में ऐसा प्रेम उत्पन्न करके घृणा या राग-द्वेष से मुक्त हो सकते
हैं? दूसरे शेष तीन वर्गों में से कोई मनुष्य नहीं हो सकता।
नहीं सभी चारों वर्ग ऐसा कर सकते हैं, अश्वलायन ने उत्तर दिया।
भगवान बुद्ध ने पूछा, ‘‘अश्वलायन! क्या तुमने कभी सुना है, कि यवन और
कम्बोज राष्ट्रों और अन्य निकटवर्ती राष्ट्रों में, केवल दो वर्ग ही हैं, यथा, मालिक
और दास, और जहाँ एक मालिक एक दास बन सकता है तथा इसके विपरीत
भी!’’
‘‘हाँ, मैंने ऐसा सुना है,’’ अश्वलयान ने उत्तर दिया।
‘‘यदि तुम्हारा चातुर्वर्ण एक आदर्श समाज है, तो यह सार्वभौमिक क्यों नहीं
है?’’
- इन बातों में से किसी एक पर भी अश्वलयान अपने जातिवाद और असमानता
के सिद्धांत का बचाव करने में समर्थ नहीं हो पाया और वह पूर्णता मौन हो
गया था। उसे अंत में बुद्ध का शिष्य ही बनना पड़ा।
- वासेट्ठ नामक एक ब्राह्मण ने तथागत के धर्म को ग्रहण कर लिया था। उसके
धर्मान्तरण के लिये ब्राह्मण उसे बुरा-भला कहा करते थे।
- एक दिन वह भगवान बुद्ध के पास गया और उनके सामने वह सब कुछ कह
दिया, जो ब्राह्मण उसको कहा करते थे।
- तब वासेट्ठ ने कहा, ‘‘भगवन्! ब्राह्मण लोग इस प्रकार कहते हैं, केवल एक
ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ सामाजिक स्तर का है, अन्य निम्न-स्तर के हैं। केवल एक ब्राह्मण
ही शुक्ल-वर्ण होता है, अन्य वर्ण साँवलें होते हैं। केवल ब्राह्मण ही शुद्ध वंश
के होते हैं, अब्राह्मण नहीं। केवल ब्राह्मण ही ब्रह्म की असली संतान हैं, उसके
मुख से जन्मे ब्रह्म की संतानें, ब्रह्म द्वारा रचित ब्रह्मा के उत्तराधिकारी हैं।’’
- ‘‘जहाँ तुम्हारा सम्बन्ध है, तुम अभिजात्य वर्ग का परित्याग करके उस निम्न वर्ग
में सम्मिलित हो गये हो, सिरमुंडे भिक्षुओं में, गँवारों, उन साँवली चमड़ी वालों
में, पैरों से जन्मों के वंशजों में सम्मिलित हो गये हो। ऐसा मार्ग अच्छा नहीं
है, ऐसा मार्ग उचित नहीं हैं, यहाँ तक कि तुमने, उस उच्च वर्ग का परित्याग
करके निम्न वर्ग से संगति की है, अर्थात् सिरमुण्डों, गँवारों, दासों, साँवली
चमड़ी वालों, हमारी जाति की जूतियों से उत्पन्न वर्ग में।’’
- ‘‘भगवान्! इन शब्दावली में, ब्राह्मण मुझे भला-बुरा और अपशब्दों से मेरी निन्दा
करते हैं और प्रचुर मात्रा में गाली देते हैं, इस तरह कहकर कोई कसर नहीं
छोड़ते हैं।’’