1. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के बीच अवरोधों (दीवारों) को मिटा दें। - Page 308

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  1. भगवान बुद्ध ने कहा, ‘‘निश्चय ही, वासेट्ठ! ब्राह्मण पूर्णतया प्राचीन परम्परा को

भूल गये हैं, जब वे ऐसा कहते हैं। इसके विपरीत अन्य वर्गों की सभी स्त्रियों

के समान, ब्राह्मणों की पत्नियाँ बच्चों को उत्पन्न करती और पालन-पोषण करती

देखी जाती हैं। और फिर भी सभी माता के गर्भ से उत्पन्न ब्राह्मण ही हैं, जो

कहते हैं कि ब्राह्मण ब्रह्मा की असली संतान हैं, उसके मुँह से जन्मे हैं, उसकी

संतानें, उसकी रचनायें, और उसके उत्तराधिकारी हैं। ऐसा कहकर वे ब्रह्मा की

प्रकृति का एक उपहास करते हैं।’’

  1. एक बार एसुकारी ब्राह्मण बुद्ध के पास तीन प्रश्नों पर तर्क करने के लिये गया।

  2. पहला प्रश्न जो उसने उठाया, पेशों के स्थायी वर्गीकरण से सम्बन्धित था।

व्यवस्था के पक्ष में कहते हुए उसने प्रारम्भ किया, ‘‘मैं आपसे एक प्रश्न पूछने

के लिये आया हूँ। ब्राह्मण कहते हैं कि वे किसी की भी सेवा नहीं करेंगे,

क्योंकि वे सर्वोपरि हैं। शेष सभी उनकी सेवा करने के लिये जन्में हैं।’’

  1. ‘‘श्रमण गौतम! सेवा चार भाग में विभाजित है- (1) ब्राह्मणों द्वारा की जाने

वाली सेवा, (2) क्षत्रियों द्वारा की जानेवाली सेवा, (3) वैश्यों द्वारा की जाने

वाली सेवा और (4) शूद्रों द्वारा की जाने वाली सेवा, किन्तु शूद्र की सेवा तो

कोई अन्य शूद्र ही कर सकता है? ‘‘इस पर आदरणीय गौतम को क्या कहना

है?’’

  1. भगवान बुद्ध से प्रश्न पूछ कर उसको उत्तर दिया गया, ‘‘क्या सम्पूर्ण संसार

ब्राह्मणों के सेवा के इस वर्गीकरण से सहमत है?’’ भगवन् ने पूछा।

  1. ‘‘जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं न तो यह दावा करता हूँ कि सभी सेवायें की

जानी चाहियें और न यह कि सभी सेवाओं को अस्वीकार किया जाना चाहिये।

यदि सेवा एक मनुष्य को बुरा और अच्छा नहीं बनाती है, वह नहीं की जानी

चाहिए_ किन्तु यदि यह उसे बेहतर और बुरा नहीं बनाती तब वह भी की जानी

चाहिये।’’

  1. ‘‘यह मार्गदर्शक कसौटी है, जिस पर क्षत्रियों, ब्राह्मणों, वैश्यों, शूद्रों की सेवा

के बारे में समान रूप से निर्णय किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी

सेवा को अस्वीकार कर देना चाहिये, जो उसे बुरा बनाती है और केवल ऐसी

सेवा को स्वीकार करना चाहिए जो उसे एक बेहतर मनुष्य बनाती हैं।’’

  1. एसुकारी द्वारा उठाया गया अगला प्रश्न था, ‘‘एक मनुष्य के स्तर के निर्धारण

में कुल और वंश का एक स्थान क्यों नहीं होना चाहिए?’’

  1. इस प्रश्न पर भगवान बुद्ध ने इस प्रकार उत्तर दिया, ‘‘जहाँ तक कुल के

अभिमान की बात है, जिस कुल में एक मनुष्य जन्म ग्रहण करता है, वह