280 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
केवल उसका नाम निर्धारित करता है, भले ही वह क्षत्रिय या ब्राह्मण या वैश्य
वंश में पैदा हुआ हो। जैसे कि अग्नि उस नाम से पुकारी जाती है, जिस ईंधन
से वह प्रज्ज्वलित की जाती है, और इस तरह या तो एक लकड़ी की आग
या एक चैली की आग, या एक लकड़ी की गाँठ की आग या एक उपले
की आग कही जाती हैं। ठीक उसी प्रकार से मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ आर्य,
श्रेष्ठ, सद्धम्म मनुष्य के लिये असली सम्पत्ति का स्रोत है, जन्म से तो केवल
चार वर्णों में से किसी न किसी एक में उसका नाम निर्धारित होता है।’’
- ‘‘न वंश परम्परा से, न अच्छी शक्ल होने और न धन होने से कोई अच्छा या
बुरा होता है। अच्छे वंश में पैदा हुआ आदमी भी तो एक हत्यारा, एक चोर,
एक व्यभिचारी, एक झूठा, एक चुगलखोर, एक कटुभाषी, एक गप्पी, एक लोभी
मनुष्य, विद्वेषी या मिथ्या दृष्टि वाला मनुष्य होता है। इसलिए मैं दावा करता हूँ
कि श्रेष्ठ वंश में उत्पन्न कोई अच्छा मनुष्य नहीं होता या तुम एक श्रेष्ठ वंश के
मनुष्य को पाओगे जो इन सभी दुर्गुणों से निर्दोष है_ और इसलिये, मैं दावा करता
हूँ कि यह वंश-परंपरा का कारण नहीं है जो एक मनुष्य को बुरा बनाती है।’’
- तीसरा प्रश्न जो एसुकारी ने उठाया था, जो प्रत्येक वर्ग के लिये नियत जीविका
अर्जित करने के तरीकों से सम्बन्धित था।
- एसुकारी ब्राह्मण ने तथागत ने कहा, ‘‘ब्राह्मण चार तरह के जीविका के साध
नों का विधान करते हैं_ ब्राह्मणों के लिये भिक्षा से, क्षत्रियों के लिये उनके
तीर-कमान से, वैश्यों के लिए व्यापार, कृषि करने व और पशु-पालन से, और
शूद्रों के लिये उसके कंधों से लटकी बँहगी पर फसल ढोने से। यदि इनमें से
कोई भी किसी अन्य पेशे के लिये अपना पेशा छोड़ता है, वह ऐसा काम करता
है जो उसे नहीं करना चाहिये, यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई चौकीदार किसी
दूसरे की सम्पत्ति पर अपना अधिकार कर ले, जो कि उसकी नहीं है। इस पर
श्रमण गौतम को क्या कहना है?’’
‘‘क्या सम्पूर्ण संसार इस ब्राह्मणी वर्गीकरण से सहमत है?’’ तथागत ने पूछा।
‘‘नहीं,’’ एसुकारी ने उत्तर दिया।
वासेट्ठ ने तथागत से कहा, ‘‘जो महत्त्वपूर्ण है वह है उच्च आदर्श, न कि
श्रेष्ठ वंश।’’
- ‘‘कोई जाति नहीं, कोई असमानता नहीं, कोई ऊंच-नीच नहीं, कोई हीनता नहीं,
सभी समान हैं। यही है जिसकी तथागत ने देशना दी।’’
- ‘‘स्वयं को दूसरों के साथ एक कर दो जैसे वे हैं, वैसा मैं हूँ। जैसा मैं हूँ, वैसे
वे हैं,’’ ऐसा बुद्ध ने कहा।