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3. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के मध्य समानता की
अभिवृद्धि करे
मनुष्य असमान ही जन्म लेते हैं।
कुछ हृष्ट-पुष्ट होते हैं, कुछ कमजोर होते हैं।
कुछ अधिक बुद्धिमान होते हैं, कुछ कम या बिल्कुल नहीं होते।
कुछ के पास अधिक क्षमता होती है, कुछ के पास कम।
कुछ खाते-पीते होते हैं, कुछ दरिद्र होते हैं।
सभी को जीवन-संघर्ष में प्रवेश करना पड़ता है।
जीवन-संघर्ष में यदि असमानता को स्वाभाविक रूप से स्वीकार कर लिया
जाये, तो सबसे कमजोर सदैव ही हार जायेगा।
- क्या इस ‘असमानता’ के नियम को जीवन का नियम बनने दिया जाना
चाहिये?
- कुछ इस आधार पर सकारात्मक उत्तर ‘हाँ’ में देते हैं। उनका तर्क ‘जीवन-संघर्ष’
में टिकने के लिए अधिक योग्य होगा, वही टिका रहेगा।
प्रश्न है, ‘‘क्या योग्यतम आदमी ही समाज की दृष्टि से श्रेष्ठतम है?’’
कोई भी इसका निश्चयात्मक उत्तर नहीं दे सकता है।
इसी सन्देह के कारण धम्म ‘समानता’ का उपदेश देता है, क्योंकि समानता
श्रेष्ठतम को बने रहने में सहायता कर सकती है, भले ही श्रेष्ठतम योग्यतम
नहीं भी हो सकती।
- समाज ‘श्रेष्ठतम’ आदमी को चाहता है, ‘योग्यतम’ को नहीं।
- इसलिये, यही प्राथमिकता है, जिसके कारण धम्म समानता का समर्थक है।
- भगवान बुद्ध का यही दृष्टिकोण था और इसी कारण से उन्होंने प्रमाणित किया
कि धम्म जो समानता का उपदेश नहीं देता है अपनाने योग्य नहीं है। 16. क्या आप एक ऐसे विचारों का सम्मान कर सकते हैं या विश्वास कर सकते
हैं, जो उन कार्यों की सलाह देता है, जो दूसरों को दुख पहुँचाकर स्वयं के
लिये सुख प्राप्त करने की शिक्षा देते हैं, या स्वयं को दुख पहुँचाकर दूसरों के
लिये सुख देने की शिक्षा देते हैं, या स्वयं और दूसरों, दोनों को दुख पहुँचाने
की शिक्षा देते हैं?