2. धम्म धर्म से कैसे भिन्न है? - Page 318

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दूसरे मनुष्य के प्रति व्यवहार है।

  1. इससे यह स्पष्ट होता है कि एक मनुष्य को यदि वह अकेला है, तो उसे ‘ध

म्म’ की आवश्यकता नहीं है।

  1. किन्तु जब दो मनुष्य एक दूसरे से परस्पर सम्बन्ध के साथ रहते हैं, तो उन्हें

धम्म के लिए स्थान अवश्य खोजना होगा, भले ही वे इसे चाहें या न चाहें।

उन दोनों में से कोई भी इससे बच नहीं सकता।

  1. दूसरे शब्दों में, समाज का कार्य ‘धम्म’ के बिना नहीं चल सकता।
  2. समाज के तीन विकल्पों में से एक का चुनाव करना ही पड़ेगा।
  3. शासन के साधन हेतु समाज किसी भी धम्म को न रखने का चुनाव कर सकता

है। यदि वह शासन का साधन नहीं है तो धम्म कुछ भी नहीं है। 15. इसका अर्थ है समाज अराजकता के पथ का चुनाव करता है। 16. दूसरे, समाज पुलिस का अर्थात् शासन के साधन हेतु तानाशाही का चुनाव कर

सकता है।

  1. तीसरे, समाज धम्म और जब कभी लोग धम्म का पालन करने में असफल रहें,

तो दण्डाधिकारी का चुनाव कर सकता है।

  1. अराजकता और तानाशाही में स्वतन्त्रता नहीं है।

  2. केवल तीसरे विकल्प में ही स्वतन्त्रता जीवित रहती है।

  3. इसलिए जो स्वतन्त्रता चाहते हैं। उन्हें धम्म रखना अनिवार्य है।

  4. अब धम्म क्या है? और धम्म की आवश्यकता क्यों है? भगवान बुद्ध के अनुसार

धम्म के दो प्रधान तत्त्व हैं-प्रज्ञा और करुणा।

  1. प्रज्ञा क्या है? और प्रज्ञा क्यों? प्रज्ञा समझ या निर्मल बुद्धि है। भगवान बुद्ध ने

प्रज्ञा को अपने धम्म की दो आधारशिलाओं में से एक बनाया था क्योंकि वे

अंधविश्वासों के घर के लिये कोई गुंजाईश नहीं छोड़ना चाहते थे। 23. करुणा क्या है? और करुणा क्यों? करुणा प्रेम, दया (मैत्री) है। क्योंकि इसके

बिना समाज न तो जीवित रह सकता और न विकास कर सकता है, इसीलिये

भगवान बुद्ध ने इसे अपने धम्म की दूसरी आधारशिला बनाया था। 24. भगवान बुद्ध के ‘धम्म’ की यही परिभाषा है।

  1. ‘धम्म’ की यह परिभाषा धर्म की परिभाषा से कितनी भिन्न है?