290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- भगवान बुद्ध द्वारा दी गयी ‘धम्म’ की परिभाषा कितनी प्राचीन है, फिर भी
कितनी आधुनिक है।
कितनी आदिम फिर भी कितनी मौलिक।
किसी से भी उधार नहीं ली गयी, फिर भी कितनी सत्य।
प्रज्ञा और करुणा का एक विशिष्ट सम्मिश्रण तथागत का धम्म है।
धर्म और धम्म के मध्य यही अन्तर है।
3. ‘धर्म’ का उद्देश्य और ‘धम्म’ का उद्देश्य
- ‘धर्म’ या ‘रिलीजन’ का उद्देश्य क्या है? ‘धम्म’ का उद्देश्य क्या हैं? क्या वे
एक ही और समान हैं? या वे भिन्न-भिन्न हैं?
- इन प्रश्नों के उत्तर दो सूक्तों में पाये जा सकते हैं, एक जिसमें भगवान बुद्ध
और सुनक्खत्त के मध्य तथा दूसरा बुद्ध और पोट्ठपाद के मध्य हुआ संवाद। 3. तथागत एक बार मल्लों के मध्य, उनके अनुपिय नगर में विहार करते थे। 4. तब यथागत ने पूर्वाह्न में अपना चीवर धारण कर और अपना भिक्षा-पात्र लेकर
भिक्षा के लिये नगर में प्रवेश किया।
- रास्ते में उन्होंने सोचा कि भिक्षा हेतु जाने के लिए अभी काफी जल्दी है। अतः
वे विहार भूमि चले गये, जहाँ भग्गव परिव्राजक निवास करते थे और उसे
आवाज दी।
- तथागत को आता देख कर भग्गव उठ खड़ा हुआ, अभिवादन किया और बोला,
‘‘कृपया! सम्भवतः आपको बैठना अच्छा लगे, तो यह एक आसन आपके लिये
तैयार है।
- उस पर तथागत बैठ गये और भग्गव एक अपेक्षाकृत नीचा आसन लेकर उनके
पास ही बैठ गया। इस प्रकार बैठकर परिव्राजक भग्गव तथागत से इस प्रकार
बोलाः
- ‘‘कुछ दिन हुए, भगवान्! काफी दिनों पहले, लिच्छवी का सुनक्खत्त मुझे मिलने
आया था और इस प्रकार बोला थाः मैंने अब तथागत को छोड़ दिया है, भग्गव!
अब मैं और अपने गुरु के रूप में उनके अधीन नहीं रह रहा। क्या वास्तव में
यह ठीक ही है, जैसा कि उसने कहा है?’’