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- ‘‘भग्गव! यह ठीक ऐसा ही है, जैसा सुनक्खत्त ने कहा है,’’ तथागत ने उत्तर
दिया।
- इसके आगे तथागत ने ‘‘कुछ दिन हुए, भग्गव, काफी दिनों पहले, नुसक्खत्त मुझसे
मिलने आया था और इस प्रकार बोला, ‘अब मैं तथागत के शिष्यत्व का त्याग
करता हूं। तथागत, मैं अब से अपने गुरु के रूप में उनके अधीन नहीं रहूँगा।’ जब
उसने मुझसे यह कहा, मैंने उससे कहा, ‘किन्तु अब, सुनक्खत्त! क्या मैंने कभी
तुमसे कहा था, आ, सुनक्खत्त! (मेरे शिष्य के रूप में) मेरे अधीन रह।’’
‘‘नहीं भगवान! ऐसा आपने कभी नहीं कहा।’’
‘‘या कभी तूने मुझसे कहा था कि मैं तथागत को अपने गुरु के रूप में स्वीकार
करता हूं?’’
‘‘नहीं, भगवान! मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।’’
‘‘तब मैंने उससे पूछा, ‘जब मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा, और न तूने भी मुझसे
नहीं कहा, तो तू क्या है? और मैं क्या हूँ, जो तू मुझे त्यागने की बात करता
है? मूर्ख कहीं के, इसमें स्वयं तेरा ही दोष नहीं है?’’
- सुनक्खत्त बोला, ‘‘लेकिन भगवान! आप मुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे
काई अद्भुत चमत्कार (प्रातिहार्य) नहीं दिखाते हैं।’’
- ‘‘क्यों, सुनक्खत्त! क्या मैंने कभी तुझसे कहा था, ‘आ! मुझे अपने गुरु के रूप
में स्वीकार करो, सुनक्खत्त! मैं तुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई
अद्भुत चमत्कार (प्रातिहार्य) दिखाऊँगा?’’
‘‘भगवान! ऐसा आपने कभी नहीं कहा।’’
‘‘या सुनक्खत्त कभी तूने मुझसे कहा था, ‘मैं तथागत को अपने गुरु के रूप
में स्वीकार करने को तैयार हूँ, क्योंकि वे मुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से
परे अद्भुत चमत्कार (प्रातिहार्य) दिखलायेंगे?’’
‘‘भगवान! नहीं। मैंने ऐसा नहीं कहा था।’’
‘‘जब न मैंने तुझसे कहा, और तूने ही मुझसे कहा, तो मूर्ख मनुष्य, जो तू मुझे
त्यागने की बात करता है? तू क्या सोचता है, सुनक्खत्त? चाहे सामान्य मनुष्य
की शक्ति से परे प्रातिहार्य दिखाए जाएं या नहीं, क्या मेरे धम्म की शिक्षा देने
का यही उद्देश्य नहीं है कि इसका अनुसरण करने वाले को आगे से दुखों का
सम्पूर्ण विनाश को प्राप्त हो सकेगा?’’