292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘भगवान! चाहे इस प्रकार प्रतिहार्य दिखाए जाए या नहीं, निस्सन्देह यह ही
उद्देश्य है, जिसके लिये तथागत ने धम्म की शिक्षा दी है।’’ 22. ‘‘सुनक्खत्त! तब उस उद्देश्य के लिये इसका कोई महत्त्व नहीं है, चाहे प्रतिहार्य
दिखाए जाए या नहीं, तो तुम्हारे लिये उनका प्रदर्शन किस काम का होगा?
देख, मूर्ख मनुष्य! इसमें स्वयं तुम्हारा कितना अधिक दोष है।’’ 23. ‘‘किन्तु, तथागत ने मुझको सृष्टि के आरम्भ के विषय में कुछ नहीं बताया
है।’’
- ‘‘क्यों सुनक्खत्त! क्या मैंने तुम्हें कभी कहा थाः आ, सुनक्खत्त! मेरे शिष्य बन
जा और मैं तुझे सृष्टि का आरम्भ बताऊँगा?’’
‘‘भगवान! आपने नहीं कहा।’’
‘‘या कभी तूने मुझसे कहा था, कि मैं तथागत का शिष्य बनूँगा, क्योंकि वे
मुझे सृष्टि का आरंभ बतायेंगे?’’
‘‘भगवान! मैंने नहीं कहा था।
‘‘जब न मैंने ही तुझे कहा, और न तू ही मुझे कुछ कहा, तो तू क्या है और मैं
क्या हूँ, मूर्ख मनुष्य, कि तू उस आधार पर मुझे त्यागने की बात करता है? तू
क्या सोचता है, सुनक्खत्त? चाहे सृष्टि का प्रारम्भ बताया जाये, या नहीं बताया
जाये क्या, मेरे धम्म की शिक्षा का यही उद्देश्य नहीं कि इसका अनुसरण करने
वाला अपने दुःख का नाश कर सकेगा?’’
- ‘‘भगवान चाहे आप सृष्टि के आरम्भ का पता बताएं और चाहे न बताएं। उन्हें
बतायें या नहीं, निस्सन्देह यह ही उद्देश्य है, जिसके लिये तथागत ने धम्म की
शिक्षा दी है, वह अपने दुख का नाश करेगा।’’
- ‘‘जब, सुनक्खत्त! उस उद्देश्य के लिये इसका कोई महत्त्व ही नहीं है चाहे
सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाए या नहीं, तो तेरे लिए सृष्टि के आरम्भ
का बताना जाना, किस काम का होगा?’’
- इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म (रिलीजन, मज़हब) का तो सृष्टि के आरम्भ
के बताए जाने से सरोकार है, धम्म का एकदम नहीं।