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2. तथागत और पोट्ठपाद के बीच हुई चर्चा में धर्म और धम्म के
मध्य सामने आई अन्य भिन्नताएँ
- तथागत एक बार श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे।
उस समय पोट्ठपाद नामक परिव्राजक रानी मल्लिका के उद्यान में दार्शनिक
सिद्धान्तों की सामान्य व्यवस्थाओं पर चर्चा के लिये बने सभागार में निवास
कर रहा था।
- उनके साथ अनुयायी परिव्राजकों की एक काफी बड़ी संख्या थी, कोई लगभग तीन
सौ। तथागत और पोट्ठपाद के मध्य एक संवाद हुआ। पोट्ठपाद ने पूछाः 3. ‘‘तब, भगवान! यदि ऐसा ही है, तो मुझे कम से कम इतना बतायें ‘क्या संसार
शाश्वत् है? क्या केवल यही सत्य है, और अन्य मत मूर्खता मात्र हैं’?’’ 4. तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘पोट्ठपाद! मैंने कब कहा है कि यही मत ठीक है कि
‘संसार अनंत है’ और सब मूर्खता है, इस विषय पर मैंने कोई मत व्यक्त नहीं
किया है।’’
- तब, उन्हीं शब्दों में, पोट्ठपाद ने निम्नलिखित सभी प्रश्नों को पूछाः (i) ‘क्या संसार शाश्वत नहीं है?’
(ii) ‘क्या संसार ससीम है?’
(iii) ‘क्या संसार असीम है?’
(iv) ‘क्या आत्मा और शरीर एक ही हैं?’
(v) ‘क्या आत्मा एक शरीर और शरीर भिन्न-भिन्न है।’
(vi) ‘क्या तथागत मरणोपरांत पुनः जन्म लेते हैं?’
(vii) ‘क्या वह मरणोपरांत पुनः जन्म नहीं लेते हैं?’
(viii) ‘क्या वह मरणोपरांत पुनः जन्म लेते हैं और नहीं भी लेते हैं?’ (ix) ‘क्या वह मरणोपरांत न तो पुनः जन्म लेते हैं और ही पुनः जन्म नहीं लेते हैं?’ 6. और इस प्रकार प्रत्येक प्रश्न का तथागत ने समान ही एक ही उत्तर दियाः 7. ‘‘पोट्ठपाद! यह भी एक ऐसा विषय है, जिस पर मैंने कोई मत व्यक्त नहीं
किया है।’’
- ‘‘किन्तु तथागत ने इन विषयों पर कोई मत व्यक्त क्यों नहीं किया?’’