4. नैतिकता और धर्म - Page 323

294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘क्योंकि इन प्रश्नों का उत्तर देने से किसी को कुछ लाभ नहीं है। यह ‘धम्म’

से सम्बन्धित नहीं है, और यहाँ तक कि उचित आचरण के तत्वों को सुधारने

में सहायक नहीं है, और न तो विराग में और न राग-द्वेष से शुद्धि में, और न

शान्ति में, और न हृदय को शान्त करने में, और न वास्तविक ज्ञान में, और न

(मार्ग की उच्च अवस्थाओं) की सूक्ष्मदृष्टि में, और न निर्वाण में सहायक हैं।

इसीलिये मैंने इन विषयों पर कोई मत व्यक्त नहीं किया है।’’

  1. पोट्ठपाद ने पुनः पूछा, ‘‘तब तथागत ने किस विषयों पर व्याखित करना निर्धारित

किया हैं?’’

  1. ‘‘पोट्ठपाद! मैंने प्रतिपादित किया है, दुख क्या है_ मैंने प्रतिपादित किया है दुख

का समुदय (मूल कारण) क्या है_ मैंने प्रतिपादित किया है दुख का निरोध

क्या है, मैंने प्रतिपादित किया है वह मार्ग क्या है जिसके द्वारा दुख के निरोध

(अन्त) तक पहुँचा जा सकता है।’’

  1. ‘‘और तथागत ने इन विषयों पर तथागत ने अपने उपदेश (व्याख्यान) क्यों नहीं

दिए हैं?’’

  1. ‘‘क्योंकि पोट्ठपाद! जिन प्रश्नों का समाधान किया है वे प्रश्न लाभ के लिये

उपयुक्त हैं, ‘धम्म’ से सम्बन्धित हैं, उचित आचरण के प्रारम्भ में सहायक हैं,

विराग में, राग-द्वोष से शुद्धिकरण में, हृदय को शान्त करने में, वास्तविक ज्ञान

में, मार्ग की उच्च अवस्थाओं की सूक्ष्मदृष्टि में और निर्वाण में सहायक हैं।

इसलिये, पोट्ठपाद, मैंने ऐसा वक्तव्य प्रस्तुत किया है।’’

  1. इस संवाद में यह स्पष्ट हो गया है कि धर्म (रिलीजन, मज़हब) की क्या विषय

वस्तु है और धम्म का क्या विषय है। दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर है।

  1. धर्म का उद्देश्य संसार की उत्पत्ति की व्याख्या करना है। ‘धम्म’ का उद्देश्य

संसार का पुनर्निर्माण करना है।

4. नैतिकता और धर्म (रिलीजन या मज़हब)

  1. नैतिकता का धर्म (रिलीजन या मज़हब) में क्या स्थान है?

  2. वास्तव में सत्य यह है कि नैतिकता का धर्म (रिलीजन या मज़हब) में कोई

स्थान नहीं है।

  1. धर्म (रिलीजन या मज़हब) के अन्तर्गत ईश्वर, आत्मा, प्रार्थनायें, पूजा, कर्म-काण्ड,

रीति-रिवाज और बलि-कर्म समाहित हैं।