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- नैतिकता केवल उसी मध्य आती है जहाँ मनुष्य-मनुष्य के सम्पर्क में आता है।
- धर्म (रिलीजन या मज़हब) में नैतिकता मात्र शान्ति और व्यवस्था की स्थापना
के लिये एक सहासक हवा के झोंके की तरह आती है।
धर्म एक तिकोना टुकड़ा है।
अपने पड़ोसी के प्रति अच्छे बनो क्योंकि तुम दोनों ईश्वर के बच्चे हो।
यही धर्म रिलीजन या मज़हब का तर्क है।
प्रत्येक धर्म (रिलीजन या मज़हब) नैतिकता का उपदेश तो देता है, किन्तु
नैतिकता धर्म (रिलीजन या मज़हब) का मूलाधार नहीं है।
- यह इसके साथ जुड़ा एक रेल का डिब्बा मात्र है। यह अवसर की आवश्यकता
के अनुसार जोड़ दिया और पृथक कर दिया जाता है।
- इसलिए धर्म (रिलीजन या मज़हब) में नैतिकता का कार्य आकस्मिक और
प्रासंगिक है। जिसका कभी-कभी प्रयोजन रहता है।
- अतः धर्म (रिलीजन या मज़हब) में नैतिकता प्रभावकारी नहीं है।
5. धम्म और नैतिकता
धम्म में नैतिकता का क्या स्थान है?
सीधा उत्तर है नैतिकता धम्म है और धम्म नैतिकता है।
दूसरे शब्दों में यद्यपि धम्म में ईश्वर का कोई स्थान नहीं है, तो भी धम्म में
‘नैतिकता’ का वही स्थान है जो धर्म में ‘ईश्वर’ का।
- धम्म में प्रार्थनाओं, तीर्थ-यात्राओं, कर्म-काण्डों, रीति-रिवाजों या बलियों के
लिए कोई स्थान नहीं है।
- ‘नैतिकता’ ही धम्म का सार है। इसके बिना कोई ‘धम्म’ नहीं है।
- धम्म में जो नैतिकता है, वह मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्री करने की सीधी
आवश्यकता से उत्पन्न होती है।
- इसमें ईश्वर की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। यह ईश्वर को प्रसन्न करने
के लिये नहीं है कि मनुष्य नैतिकता का पालन करें। यह स्वयं उसके अपने
कल्याण के लिये है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से मैत्री करे।