296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
6. केवल नैतिकता ही पर्याप्त नहीं है, इसे पवित्र और व्यापक
भी होना चाहिए
एक वस्तु कब पवित्र होती है? वस्तु पवित्र क्यों होती है?
प्रत्येक मानव-समाज में, चाहे वह आदिम अवस्था का हो या आधुनिक, कुछ ऐसी
वस्तुयें या मान्यतायें हैं, जिन्हें वह पवित्र मानता है और कुछ और अपवित्र। 3. जब एक वस्तु या मान्यता पवित्र होने की अवस्था तक पहुँच जाती हैं तो इसका
अर्थ है कि उसका उल्लंघन नहीं हो सकता है, निस्संदेह उसे निषिद्ध जानकर
स्पर्श भी नहीं किया जा सकता है।
- इसके विपरीत, एक वस्तु या मान्यता जो अपवित्र है, अर्थात्, पवित्रता के क्षेत्र
के बाहर है, का उल्लंघन किया जा सकता है। इसका अर्थ है कोई मनुष्य बिना
किसी भय के या अन्तःकरण की आशंकाओं को अनुभव न करते हुए इसके
विपरीत कार्य कर सकता है।
- पवित्र का तात्पर्य है धार्मिकता इसका अतिक्रमण करना एक अपवित्रीकरण है
अर्थात् धर्म (मज़हब) की मर्यादा का उल्लंघन करना।
- एक वस्तु को ‘पवित्र’ क्यों बनाया जाता है? प्रश्न के क्षेत्र को विषय तक
सीमित रखने के लिये पूछा जा सकता है, नैतिकता को ‘पवित्र’ क्यों बना दिया
गया?
- ऐसा प्रतीत होता है कि नैतिकता को पवित्र बनाने में तीन बातों ने अपनी भूमिका
निभाई है।
- पहली बात तो यह है कि जो श्रेष्ठ है, सामाजिक हित की दृष्टि से उसे सुरक्षित
रखना चाहिए।
- इस प्रश्न की पृष्ठभूमि इस बात में अन्तर्निहित है, जिसे ‘जीवन-संघर्ष’ और
उसमें ‘योग्यतात्मक जीवित बने रहना’ कहते हैं।
- यह प्रश्न ‘विकासवाद के सिद्धान्त’ से उत्पन्न होता है। यह सामान्य ज्ञान है
कि मानव-समाज में जो विकास हुआ है, वह ‘जीवन-संघर्ष’ के द्वारा हुआ है
क्योंकि आरम्भिक युग में भोजन-सामग्री बड़ी सीमित मात्रा में प्राप्त थी। 11. संघर्ष भयानक व दुखद रहा है। प्रकृति के पंजे और दाँत रक्त-रंजित रहे हैं। 12. ऐसे ‘जीवन संघर्ष’ में जो भयानक और दुखद रहा है, उसमें केवल योग्यतम
ही जीवित बचा है।
- समाज की मूल-अवस्था ऐसी ही रही है।