304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
चेतना ऊष्णता पर निर्भर करती है और ऊष्णता चेतना पर।’’ 30. महाकोट्ठित ने पूछा, ‘‘ऐसी कितनी चीजें हैं, जिनके मुक्त होने पर ही शरीर
को मरा हुआ समझकर निर्जीव काठ की तरह एक ओर रख दिया या मरा हुआ
फेंक दिया जाता है।’’
- सारिपुत्त ने उत्तर दिया, ‘‘चेतना (जीवितेन्द्रिय), ऊष्णता और विज्ञान।’’
- महाकोट्ठित ने पूछा, ‘‘एक मृत शरीर और एक समाधिस्थ भिक्षु में, जिसमें
संज्ञा और वेदना का निरोध हो चुका है, क्या अन्तर है?’’
- सारिपुत्त ने उत्तर दिया, ‘‘मृत शरीर में न केवल शरीर, वाणी और मन की
क्रिया-शक्ति स्थिर और शांत हो जाती है, बल्कि चेतना भी निःशक्त, ऊष्णता
भी शमित और इन्द्रियाँ भी छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जबकि समाधिस्थ भिक्षु में
चेतना बनी रहती है, ऊष्णता बनी रहती है और इन्द्रियाँ निर्दोष बनी रहती हैं।
हाँ श्वास-प्रश्वास, अवलोकन और संज्ञा स्थिर और शान्त हो जाती हैं।’’ 34. यह सम्भवतः मृत्यु या उच्छेद की सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वाधिक सम्पूर्ण व्याख्या है। 35. इस संवाद में केवल एक कमी है। महाकोट्ठित को सारिपुत्त से एक प्रश्न और
पूछना चाहिये था कि ‘ऊष्णता’ क्या है?
- तो सारिपुत्त ने इसका क्या उत्तर दिया होता, इसकी कल्पना करना सरल नहीं है,
किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि ‘ऊष्णता’ का अर्थ है ‘शक्ति’। 37. इस तरह से यदि इस प्रश्न के उत्तर को थोड़ा अधिक स्पष्ट कर दिया जाये
कि मरने पर क्या होता है? तो यथार्थ उत्तर होगा कि शरीर शक्ति उत्पन्न करना
बन्द कर देता है।
- किन्तु यह तो केवल उत्तर का एक अंश ही है। क्योंकि मृत्यु का अर्थ यह भी
है कि जो कुछ भी शरीर से शक्ति निकल गयी है। आकाश में संचरित शक्ति
के सामूहिक पुंज के साथ मिल जाती है।
- अतः उच्छेद या मृत्यु के दो पहलू हैं। अपने पहलुओं में से एक में इसका अर्थ
शक्ति की उत्पत्ति का निरोध है। दूसरे पहलू में इसका अर्थ शक्ति के सामूहिक
संचरित पुंज में कुछ नई वृद्धि हो जाना है।
- सम्भवतः उच्छेद के इन दो पहलुओं के कारण ही बुद्ध ने कहा है कि वह
एक पूर्ण उच्छेदवादी नहीं हैं। जहाँ तक कि आत्मा से प्रयोजन है, तो वे एक
उच्छेदवादी थे और जहाँ तक कि भौतिक तत्त्व (नाम-रूप) का प्रयोजन है,
तो वे एक उच्छेदवादी नहीं थे।