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- इस प्रकार व्याख्या किये जाने से यह समझना सरल है कि भगवान बुद्ध ने
क्यों कहा कि वह एक उच्छेदवादी नहीं हैं। वे भौतिक पदार्थ (नाम-रूप) की
पुनरुत्पति (पुनर्भव) में विश्वास करते थे और आत्मा के पुनर्जन्म (Transmigration
of sure) में नहीं।
- इस प्रकार व्याख्या किये जाने से बुद्ध का दृष्टिकोण विज्ञान के सर्वथा अनुकूल
होता है।
- केवल इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि बुद्ध पुनर्जन्म में अर्थात् पुनर्भव
(Rebirth) विश्वास करते थे।
- शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। विज्ञान इसी की पुष्टि करता है। उच्छेद का यह
अर्थ कि मृत्यु के उपरांत कुछ नहीं शेष रहता विज्ञान के विरुद्ध होगा। क्योंकि
इसका यह अर्थ होगा कि सामूहिक रूप से शक्ति में सातत्य नहीं है। 45. यही एक मात्र ऐसा तरीका है, जिससे दुविधा को हल किया जा सकता है।
3. पुनर्जन्म किस (व्यक्ति) का?
सबसे कठिन प्रश्न है, पुनर्जन्म किस (व्यक्ति) का?
क्या वही मृत व्यक्ति एक नया जन्म ग्रहण करता है?
क्या बुद्ध इस सिद्धांत पर विश्वास करते थे? इसका उत्तर ‘‘इसकी सर्वाधिक
असंभावना है।’’
- यदि मृत व्यक्ति के शरीर के सभी भौतिक अंश पुनः नए सिरे से मिलकर एक
नये शरीर का निर्माण कर सकें, तभी यह मानना सम्भव है कि उसी आदमी
का पुनर्जन्म हुआ।
- यदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के मृत शरीरों के संमिश्रण या विभिन्न तत्त्वों से एक
नये शरीर का निर्माण तो हुआ, किन्तु उसी सचेतन प्राणी का पुनर्जन्म नहीं। 6. यह विषय भिक्षुणी खेमा द्वारा राजा प्रसेनजित को बहुत अच्छी तरह से समझा
दिया गया था।
- एक बार तथागत श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम विहार में ठहरे हुए
थे।
- उस अवसर पर भिक्षुणी खेमा, कोशल वासियों के मध्य अपनी चारिका करने के
बाद, श्रावस्ती और साकेत के बीच तोरणवत्थु नामक स्थल पर ठहरी हुई थीं। 9. उस समय कोशल का राजा प्रसेनजित साकेत से श्रावस्ती की ओर यात्रा कर