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- ‘‘तब क्या आपके पास कोई लेखाकार, शीघ्र गणना करनेवाला या गणक है,
जो विशाल समुद्र के जल की गणना कर कि इसमें कितना जल है, इतने सौ
या इतने हजार लाख घड़े (मेलन) जल है?’’
‘‘निस्सन्देह, नहीं।’’
‘‘तो ऐसा क्यों है?’’
‘‘भिक्षणु खेमा! समुद्र असीम, अथाह, अन्तहीन और विशाल है।’’
इसी प्रकार महाराज! यदि कोई तथागत को उनके शारीरिक रूप द्वारा माप करना
चाहे, तो तथागत का वह शारीरिक रूप परित्यक्त है, जड़मूल से कट चुका
है, एक कटे-ताड़वृक्ष की ठूँठ की तरह बन गया है, वह अभाव को प्राप्त हो
गया है और अब उसकी पुनरुत्पत्ति की सम्भावना नहीं रही है। महाराज! शरीर
के रूप में पहचाने जाने से तथागत मुक्त हो चुके हैं, वे गम्भीर, असीम और
अथाह हैं, ठीक समुद्र के समान। तथागत मरणोपरान्त रहते हैं, यह भी नहीं
कहा जा सकता है। ‘तथागत मरणोपरान्त नहीं रहते हैं, यह भी कहा नहीं जा
सकता है। ‘तथागत मरणोपरान्त रहते हैं और नहीं रहते हैं, न रहते है और न
नहीं रहते,’ यह भी नहीं कहा जा सकता है।
- ‘‘इसी प्रकार हे महाराज! यदि कोई तथागत को वेदना द्वारा निरुपित करना चाहे,
तो तथागत की वह वेदना परित्यक्त है, जड़-मूल से कट चुकी है जैसे कटे
हुए ताड़-वृक्ष की तरह हो गई है.... सम्भावना नहीं रही है। महाराज! वे गम्भीर,
असीम और अथाह हैं, जैसे कि महान् समुद्र, इसलिए यह भी नहीं कहा जा
सकता कि ‘तथागत मरणोपरान्त रहते हैं। मरणोपरान्त नहीं रहते हैं।’’ 26. ‘‘इसी प्रकार यदि कोई तथागत को संज्ञा से, संस्कारों से, विज्ञान से मापना
चाहे, तो तथागत का यह विज्ञान परित्यक्त है, वह जड़-मूल से कट चुका है,
वह कटे हुए ताड़-वृक्ष की तरह हो गया है..... सम्भावना नहीं रही है। महाराज!
तथागत के विज्ञान के रूप में पहचाने जाने से तथागत मुक्त हो चुके हैं, वे
गम्भीर, असीम और अथाह हैं जैसे कि महान समुद्र। अतः यह भी नहीं कहा
जा सकता है ‘तथागत मरणोपरान्त रहते हैं..... मरणोपरान्त नहीं रहते हैं।’’’ 27. तब कोशल का राजा प्रसेनजित भिक्षुणी खेमा के वचनों से प्रसन्न हुआ और
आनन्दित हुआ। और वह अपने आसन से उठा, उन्हें यथायोग्य अभिवादन किया
और चला गया।
- अब एक अन्य अवसर पर राजा प्रसेनजित् तथागत के दर्शनार्थ गया और उनके
पास पहुँचने पर उन्हें अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। इसी प्रकार बैठे हुए
वह तथागत से बोलाः