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विभाग - दो
कर्म
1. क्या बौद्धों का कर्म-सिद्धांत ब्राह्मणवादी सिद्धांत के समान ही हैं?
- बुद्ध के धम्म में कोई भी ऐसा सिद्धान्त नहीं है, जिसने इतनी अधिक भ्रान्ति
उत्पन्न की है, जितनी कर्म के इस सिद्धांत ने।
- बुद्ध के धम्म में इसका क्या स्थान है और इसका क्या महत्व है?
- अज्ञानी हिन्दू समझ के पूर्णतया अभाव के कारण मात्र शब्दों की समानता की
तुलना करके कहते हैं कि बौद्ध धम्म और ब्राह्मणवाद या हिन्दू धर्म एक समान
ही हैं।
- ब्राह्मणों का शिक्षित और रुढि़वादी वर्ग भी ऐसा ही कहता है। वे ऐसा जान-बूझकर
अज्ञानी जनता को भ्रम में डालने के लिये करते हैं।
- शिक्षित ब्राह्मण भली-भाँति जानते हैं कि बौद्ध-कर्म का सिद्धान्त ब्राह्मणवादी
कर्म के सिद्धांत से सर्वथा भिन्न है। फिर भी वे कहने में लगे रहते हैं कि बौद्ध
धर्म और ब्राह्मणवाद या हिन्दू धर्म एक समान ही हैं।
- पारिभाषिक शब्दावली की समानता उनको अपने झूठे तथा विद्वेषपूर्ण प्रचार में
आसानी पहुँचाती है।
- अतः यह आवश्यक है कि स्थिति का ध्यानपूर्वक परीक्षण किया जाए।
- बुद्ध का कर्म का सिद्धांत, यद्यपि शाब्दिक समानता कितनी ही क्यों न हो अपने
अर्थ में ब्राह्मणवादी कर्म के सिद्धांत के समान हो ही नहीं सकता। 9. दोनों के आधार-वाक्य इतने व्यापक रूप से भिन्न हैं, निस्सन्देह इतने व्यापक,
रूप से विरोधी हैं कि दोनों का परिणाम समान हो ही नहीं सकता। वे भिन्न
होने ही चाहिएं।
- हिन्दू कर्म के सिद्धांत द्वारा, आत्मा की मान्यताओं को सुविधा के लिये इस
प्रकार अभिव्यक्त किया जा सकता हैः-
- हिन्दू ‘कर्म’ का सिद्धांत ‘आत्मा’ की मान्यता पर निर्भर करता है, बौद्ध नहीं।
वास्तव में बौद्ध धम्म में ‘आत्मा’ का कोई अस्तित्व है ही नहीं। 12. ब्राह्मणवादी ‘कर्म’ का सिद्धांत वंशानुगत है।
- वह एक जन्म से दूसरे जन्म तक चलता रहता है। ऐसा इसलिये है, क्योंकि
आत्मा का संसरण होता है।