310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- बौद्ध ‘कर्म’-सिद्धांत के विषय में यह सत्य नहीं। ऐसा इसलिये भी है, क्योंकि
वहाँ कोई ‘आत्मा’ की मान्यता नहीं है।
- हिन्दू ‘कर्म’ का सिद्धांत शरीर से पृथक आत्मा के अस्तित्व पर आधारित है।
जब शरीर मरता है, तो ‘आत्मा’ उसके साथ नहीं मरती। ‘आत्मा’ उड़ जाती
है।
बौद्ध कर्म-सिद्धांत के विषय में यह सत्य नहीं है।
हिन्दू कर्म के सिद्धांत के अनुसार जब एक मनुष्य कार्य करता है, तो उसके
कर्म के दो परिणाम होते हैं। वह कर्त्ता को प्रभावित करता है और दूसरे, यह
उसकी आत्मा पर प्रभाव डालता है।
- वह जो भी कर्म करता है, उसका आत्मा पर प्रभाव पड़ता ही है।
- जब मनुष्य मरता है और जब उसकी आत्मा निकल भागती है, तो आत्मा ऐसे
संस्कारों से प्रभावित होती है।
- यह प्रभाव (संस्कार) ही, जो उसके भावी जन्म और स्थिति को निर्धारित करते
हैं।
- यह हिन्दू आत्मवादी सिद्धांत अनात्मवादी बौद्ध सिद्धांत से असंगत है।
- इन कारणों से बौद्ध कर्म-सिद्धांत और हिन्दू कर्म का सिद्धांत न तो एक समान
है और न समान हो सकते हैं।
- अतः बौद्ध कर्म-सिद्धांत और ब्राह्मणवादी-कर्म के सिद्धांत एक समान बतलाना
महज मूर्खता है।
- अधिक से अधिक कोई यही कह सकता है कि इस धोखेबाजी से सावधान
रहना चाहिए।
2. क्या भगवान बुद्ध यह मानते थे कि अतीत कर्म भावी जन्म को
प्रभावित करते हैं?
- कर्म का सिद्धांत भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित किया गया था। सर्वप्रथम उन्होंने
ही कहा थाः ‘‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।’’
- वे ‘कर्म’ के सिद्धांत के विषय में इतने सुस्पष्ट थे कि वे मानते थे, जब तक
कर्म के सिद्धांत का दृढ़तापूर्वक अनुपालन न किया जाये, तब तक नैतिक
व्यवस्था नहीं हो सकती।