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- बुद्ध का ‘कर्म’ का सिद्धांत केवल ‘कर्म’ से था और वह भी वर्तमान जीवन
पर उसके प्रभाव से है।
- यद्यपि, ‘कर्म’ का एक विस्तृत सिद्धांत भी है। इसके अनुसार कर्म पूर्व-जन्म
या जन्मों के किये गये कर्म को भी सम्मिलित करता है।
- यदि मनुष्य एक गरीब परिवार में जन्मा है, तो यह उसके पूर्व दुष्कर्म के कारण
है। यदि मनुष्य एक धनी परिवार में जन्मा है, तो यह उसके पूर्व सत्कर्म के
कारण है।
- यदि मनुष्य एक जन्म-जात दोष के साथ जन्मा है तो यह उसके पूर्व दुष्कर्म
के कारण है।
- यह एक अत्यन्त खतरनाक सिद्धांत है, क्योंकि कर्म की इस व्याख्या में
मानव-प्रयास के लिये कोई गुंजाइश नहीं है। उसके लिये उसके पूर्वजन्म के
कर्म द्वारा ही सब कुछ पूर्व निश्चित है।
यह विस्तृत सिद्धांत प्रायः भगवान बुद्ध पर आरोपित किया जाता है।
क्या भगवान बुद्ध ऐसे सिद्धांत पर विश्वास करते थे?
इस विस्तृत सिद्धांत का भली-भाँति परीक्षण करने के लिये अच्छा होगा कि
जिस भाषा में इसका प्रायः उल्लेख किया जाता है, उसमें थोड़ा परिवर्तन कर
दिया जाए।
- यह कहने की बजाय कि पूर्व-जन्म के ‘कर्म’ का संसरण होता है, यह बेहतर
होता, यदि यह कहें कि पूर्व-जन्म का ‘कर्म’ वंशानुगतक्रम प्राप्त होता है। 12. भाषा का यह परिवर्तन हमें वंशानुगत परम्परा द्वारा इसके परीक्षण में सक्षम बनाता
है। ऐसा करने से हमें सिद्धांत में कोई हानि नहीं होती न तो कानून में और न
ही वास्तविक अर्थ में।
- यह भाषा का परिवर्तन दो प्रश्नों को उठाना सम्भव बनाता है, जो अन्यथा नहीं
उठाये जा सकते हैं, जिनका उत्तर दिये बिना विषय को स्पष्ट नहीं किया जा
सकता।
- पहला प्रश्न है, पूर्व-जन्म के कर्म कैसे वंशानुगत मिलते हैं? उसकी प्रक्रिया
क्या है?
- दूसरा प्रश्न है, वंशानुगत के विषय में पूर्व-जन्म के कर्म की प्रकृति क्या है?
क्या वह वंशानुगत ‘गुण’ है या स्वयं अर्जित ‘गुण’ है?
- हम अपने माता-पिता के वंशानुगत क्या प्राप्त करते हैं?