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है।
- हिन्दू कर्म के सिद्धांत में एक बच्चा शरीर के अतिरिक्त अपने माता-पिता से
कुछ नहीं प्राप्त करता है। हिन्दू कर्म के सिद्धांत में बच्चे का पूर्व कर्म, बच्चे
द्वारा और बच्चे के लिये वंशानुगत है।
माता-पिता कुछ भी योगदान नहीं देते। बच्चा ही सब कुछ लाता है।
ऐसा सिद्धांत एक विसंगति से अधिक कुछ नहीं है।
जैसा ऊपर दिखाया गया है कि बुद्ध ऐसी विसंगति पर विश्वास नहीं करते थे।
(इसकी चर्चा चलने पर कि क्या मनुष्य अपने भले-बुरे कर्मों के परिणाम से
मुक्त हो जाता है, स्थविर नागसेन ने राजा मिलिन्द को उत्तर दिया था-) 33. ‘‘हाँ, यदि उसका पुनर्जन्म नहीं होता, तो वह अपने कर्मों से मुक्त हो जाता है।
यदि हो, तो नहीं।’’
राजा मिलिन्द ने कहा, ‘‘मुझे एक उदाहरण दें।’’
भिक्षु नागसेन, ‘‘राजन्! मान लें एक मनुष्य किसी के आम चुराये, तो क्या वह
चोर दण्ड का भागी होगा?’’
‘‘हाँ!’’
‘‘किन्तु जो आम (बीजके) जमीन में बोए थें, उसने वे आम तो नहीं चुराये
थे, तब वह दण्ड का भागी क्यों होगा?’’
- ‘‘क्योंकि जो उसने चुराये थे, वे उन्हीं का परिणाम थे जो उसने रोपे थे।’’
- ‘‘इसी प्रकार महाराज! यह नाम-रूप कर्म करता है, चाहे अच्छे या बुरे, और
उस कर्म से अन्य नाम रूप पुनर्जन्य ग्रहण करता है। और इसलिये वह अपने
बुरे कर्मों से मुक्त नहीं होता है?’’
‘‘बहुत अच्छा, नागसेन!’’
राजा ने नागसेन से पूछा, ‘‘नागसेन! जब एक नाम-रूप द्वारा कर्म किये जाते
हैं, तो उन कर्मों का क्या होता है?’’
- ‘‘राजन्! वे कर्म उसका पीछा करेंगे, जैसे परछाई उसका साथ कभी नहीं
छोड़ती।’’
- ‘‘क्या कोई उन कर्मों के बारे में बता सकता है, यह कहते हुए कि वे कर्म
यहाँ या वहाँ हैं?’’
- ‘‘नहीं।’’