314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
‘‘मुझे एक उदाहरण दें।’’
‘‘हे राजन्! क्या कोई किसी वृक्ष के उन फलों को दिखा सकता है, और यह
बता सकता है, जिन्हें वृक्ष ने अभी तक उत्पन्न नहीं किया है, यह कहते हुए
कि-
‘‘वे यहाँ हैं, या वहाँ।’’
‘‘निश्चय ही नहीं, मन्ते।’’
‘‘इसी प्रकार महाराज! जब तक कि जीवन-प्रवाह का उच्छेद नहीं हो जाता,
तब तक उन किए हुए कर्मों को निर्दिष्ट करना असम्भव है।’’ 50. ‘‘बहुत अच्छा, नागसेन।’’
3. क्या भगवान बुद्ध यह मानते थे कि अतीत कर्म भावी जीवन
को प्रभावित करते हैं?
(2)
- इस प्रकार भगवान बुद्ध का पूर्व-कर्म का सिद्धांत विज्ञान से मेल खाता है।
- भगवान बुद्ध पूर्व-जन्मों के कर्मों के वंशानुगत होने में विश्वास नहीं करते थे।
- जब वे मानते थे कि जन्म आनुवंशिक क्रम से माता-पिता है और जो कुछ भी
वंशानुगत बच्चे को प्राप्त होता है, वह उसके माता-पिता के माध्यम से ही होता
है, तो वे कर्मों के वंशानुगत होने में विश्वास ही कैसे कर सकते थे? 4. तर्क के अतिरिक्त इस विषय पर अधिक सीधा प्रमाण चूल-दुक्ख-खन्द,-सूत्त’
नामक सूत्त में समाहित है, जिसमें बुद्ध तथा जैनों के मध्य एक संवाद का
वर्णन है।
- इस संवाद में जो कहा वह यह है, ‘‘निगण्ठों! तुम लोगों ने पूर्व में जो बुरे कर्म
किये हैं, उन्हें इन कठोर तपस्याओं द्वारा समाप्त करते हैं। शरीर, वाणी और मन
पर प्रत्येक वर्तमान संयम पूर्व के बुरे कर्मों को समाप्त कर देगा। इस प्रकार
तपस्या द्वारा सभी पूर्व बुरे कर्मों को समाप्त कर देने से और नये बुरे कर्म न
करने से, भविष्य स्वच्छ हो जाता है_ भविष्य स्वच्छ हो जाने से पूर्व भी साफ
हो जाता है_ पूर्व के साफ हो जाने से दुख शेष नहीं रहता है_ दुख के शेष न
रहने से दुखद वेदना भी नहीं बचती_ और दुखद वेदनाओं के न बचने से सभी
दुःखों का ही क्षय हो जाता है-यह शिक्षा स्वयं को हमारे लिये प्रशंसित और