3. क्या भगवान बुद्ध यह मानते थे कि अतीत कर्म भावी जीवन को प्रभावित करते हैं? - Page 344

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अनुमोदित करती है, और हम इसमें आनन्दित होते हैं।’’

  1. तत्पश्चात्, मैंने उन निगण्ठों के ‘हां’ कहने पर कहा, -‘‘क्या तुम जानते हो कि

इससे पहले तुम्हारा अस्तित्व (पूर्व-जन्म) था या ऐसा कि आपका पूर्व-जन्म

नहीं था?’’

  1. ‘‘नहीं जानते।’

  2. ‘‘क्या तुम जानते हो कि, अपने पूर्व-जन्म में, तुम निश्चयात्मक रूप से बुरे

कर्मों के दोषी थे, और निर्दोष नहीं थे?’’

  1. ‘‘नहीं।’’

  2. ‘‘क्या तुम जानते हो कि उस पूर्व जन्म में तुम इस या उस विशेष बुरे कर्म के

दोषी थे, और निर्दोष नहीं थे?’’

  1. ‘‘नहीं।’’

  2. फिर भगवान बुद्ध और जोर देकर कहते हैं कि एक मनुष्य की स्थिति उसके

वंशानुगत द्वारा उतनी नियन्त्रित नहीं होती, जितनी कि उसके वातावरण द्वारा। 13. देवदह सुत्त-5 में भी बुद्ध यही कहते हैं, ‘‘कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसे हैं जो

समर्थन करते हैं और इस मत को मानते हैं कि व्यक्तिगत अनुभव जो कुछ भी

हों चाहे वे सुखद हों या दुखद हों या दोनों में से कोई भी नहीं हों-सभी पूर्व

जन्म के कर्मों का परिणाम होते हैं। अतः पूर्व जन्म के कर्मों के प्रायश्चित और

शुद्धिकरण द्वारा और नये बुरे कर्मों को न करने के द्वारा, भविष्य के लिये कुछ

भी नहीं प्राप्त होता है, बुरे कर्म समाप्त हो जाते हैं, जब बुरे कर्म समाप्त हो

जाते हैं, दुख का क्षय हो जाता है, जब दुख का क्षय हो जाता है, वेदना का

भी क्षय हो जाता है और जब वेदना का क्षय हो जाता है सभी दुख जीर्ण हो

जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं, यही है जिसकी निगण्ठ पुष्टि करते हैं। 14. यदि ऐसा है कि अपने पूर्व जन्म की परिस्थितियों के कारण प्राणी दुख और सुख

भोगते हैं, तो भी निगण्ठ दोषी हैं, और वह तब भी दोषी हैं, यदि परिस्थितियों

का कारण नहीं है।

  1. भगवान बुद्ध के ये कथन अब अत्यन्त प्रासंगिक हैं। यदि भगवान बुद्ध पूर्व

कर्म में विश्वास रखते, तो वे यहाँ इस समय पूर्व-कर्म के बारे में संदेह क्यों

प्रकाशित करते? यदि भगवान बुद्ध यह मानते कि दुख और सुख पूर्व-जन्म का

परिणाम है तो वे यह क्यों कहते हैं कि वर्तमान जीवन का सुख-दुख परिस्थिति

का परिणाम होता है।