316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- पूर्व-कर्म के कारण सुख-दुख का सिद्धांत पूर्णतया ब्राह्मणवादी सिद्धांत है।
पूर्व-कर्म का वर्तमान जीवन पर प्रभाव पड़े इसका ब्राह्मणवादी आत्मा के सिद्धांत
से पूर्णतया मेल बैठता है, क्योंकि वे मानते हैं कि कर्म का आत्मा पर प्रभाव
पड़ता है। किन्तु यह अनात्मवादी बौद्ध सिद्धांत के प्रतिकूल है। 17. ऐसा प्रतीत होता है कि यह पूरा का पूरा किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बाद के बौद्ध
धम्म में प्रक्षिप्त कर दिया गया है, जो या तो बौद्ध धम्म को हिन्दू धर्म के सदृश
बनाना चाहता था या जो यह नहीं जानता था कि बौद्ध-सिद्धांत क्या है। 18. यह एक कारण है, जिसके आधार पर यह माना जाना चाहिए कि भगवान बुद्ध
ऐसे सिद्धांत की देशना कभी नहीं कर सकते।
- एक दूसरा और भी अधिक सामान्य कारण है, जिसके आधार पर यह माना
जाना चाहिये कि भगवान बुद्ध ऐसे सिद्धांत की देशना कभी नहीं कर सकते। 20. भावी जन्म के संचालक के रूप में पूर्व-कर्म को स्वीकार करने के हिन्दू सिद्धांत
का आधार अन्यायपूर्ण है। ऐसे सिद्धांत के आविष्कार करने का क्या प्रयोजन
हो सकता था?
- इसका एकमात्र उद्देश्य हो सकता है कि राज्य अथवा समाज को गरीबों और
दरिद्रों की दुखावस्था के उत्तरदायित्व से सर्वथा मुक्त कर दिया जाए। 22. अन्यथा ऐसे अमानवीय और निरर्थक सिद्धांत का कभी आविष्कार नहीं होता। 23. यह सोचना भी असम्भव है कि महाकारुणिक बुद्ध ने कभी ऐसे सिद्धांत का
समर्थन किया होगा।