1. अहिंसा के भिन्न-भिन्न अर्थ और व्यवहार - Page 346

317

विभाग - तीन

अहिंसा

1. अहिंसा के भिन्न-भिन्न अर्थ और व्यवहार

  1. अहिंसा या जीव-हिंसा न करना बुद्ध की शिक्षाओं का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण

भाग है।

  1. यह करुणा और मैत्री के साथ घनिष्ठता से सम्बद्ध है।

  2. फिर भी यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या भगवान बुद्ध की अहिंसा निरपेक्ष

थी या केवल सापेक्ष? क्या यह एक शील मात्र थी अथवा एक नियम थी? 4. जो लोग भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को स्वीकार करते हैं, उन्हें अहिंसा को एक

निरपेक्ष कर्त्तव्य के रूप में स्वीकार करने में कठिनाई होती है। वे कहते हैं कि

अहिंसा की ऐसी परिभाषा बुराई के लिये अच्छाई का बलिदान तथा दुर्गुण के

लिये सद्गुण का बलिदान सम्मिलित करती है।

  1. यह प्रश्न स्पष्टीकरण की अपेक्षा करता है। ऐसा कोई विषय नहीं है, जो ‘अहिंसा’

की तुलना में अधिक भ्रम पैदा करने वाला हो।

  1. बौद्ध देशों के लोगों ने अहिंसा को किस रूप में समझा है और किस प्रकार

व्यवहार किया है?

  1. यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अवश्य ही विचार किया जाना चाहिये।
  2. सिरीलंका के भिक्षु विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध लड़े और सिरीलंका की

जनता से लड़ने के लिये कहा।

  1. दूसरी और बर्मा (म्यामार) के भिक्षुओं ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध

लड़ने से इन्कार कर दिया और बर्मी लोगों से न लड़ने के लिये कहा। 10. बर्मी लोग अण्डा खाते हैं किन्तु मछली नहीं।

  1. इसी प्रकार अहिंसा समझी गयी है और व्यवहार में लायी जाती है।
  2. हाल ही में जर्मन बौद्ध समिति ने एक प्रस्ताव पास किया, जिस अनुसार उन्होंने

पहले शील (जीव-हिंसा से विरत) अहिंसा को छोड़ कर सभी चार शीलों को

स्वीकार किया है।

  1. अहिंसा के सिद्धांत के विषय में यह स्थिति है।