2. ‘अहिंसा’ का वास्तविक अर्थ - Page 347

318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

2. ‘अहिंसा’ का वास्तविक अर्थ

  1. ‘अहिंसा’ को क्या तात्पर्य हैं?

  2. भगवान बुद्ध ने कहीं भी ‘अहिंसा’ की कोई परिभाषा नहीं की है। यदि कभी की

है, तो उन्होंने यदा-कदा ही निश्चित शब्दावली में इस विषय की चर्चा की है। 3. इसलिये परिस्थितिजन्य साक्ष्य की सहायता से ही भगवान बुद्ध के अभिप्राय का

परिणाम निकालना होगा।

  1. इस विषय पर पहला परिस्थितिजन्य साक्ष्य है कि भगवान बुद्ध को माँस भक्षण

करने पर कोई आपत्ति नहीं थी, यदि वह उन्हें उनकी भिक्षा के भाग के रूप

में अर्पित किया गया हो।

  1. यदि भिक्षु, भिक्षापात्र में अर्पित माँस खा सकता है, बशर्ते कि वह किसी प्रकार

से भी उस पशु-वध से सम्बंधित न रहा हो।

  1. भगवान बुद्ध ने देवदत्त के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर कि भिक्षा के तौर

पर उन्हें दिये जाने पर भी भिक्षुओं को माँसाहार नहीं करना चाहिये। 7. इस विषय पर अगला साक्ष्य यह है कि वह केवल यज्ञों (बलि) में पशुओं के

वध के विरोधी थी। यह उन्होंने स्वयं कहा है।

  1. ‘अहिंसा परमो धर्म’ यह एक चरम-सीमा का सिद्धांत है। यह एक जैन सिद्धांत

है, यह बौद्ध सिद्धांत नहीं है।

  1. एक अन्य साक्ष्य भी है, जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य की अपेक्षा अधिक सीधा है

और जो एक प्रकार से ‘अहिंसा’ की परिभाषा ही है। उन्होंने कहा है, ‘‘सभी

को प्रेम करो, जिससे कि तुम किसी प्राणी का वध करने की इच्छा न करो।’’

यह अहिंसा के सिद्धांत के कहने का एक सकारात्मक ढंग है। 10. इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ‘अहिंसा’ का बौद्ध सिद्धांत यह नहीं कहता कि

‘मारो नहीं’, बल्कि यह कहता है कि ‘सभी को प्रेम करो’। 11. इन कथनों के प्रकाश में यह समझ सकना कठिन नहीं है कि ‘अहिंसा’ से

भगवान बुद्ध का क्या अभिप्राय था?

  1. यह पर्याप्त स्पष्ट है कि बुद्ध का अभिप्राय ‘जीव-हत्या करने की चेतना’ और

‘जीव-हत्या करने की आवश्यकता’ के बीच भेद करना था।’ 13. जहाँ ‘जीव-हत्या’ आवश्यकता,थी वहाँ उन्होंने जीव-हत्या का निषेध नहीं किया

था।