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- उन्होंने वैसी जीव-हत्या करने को मना किया था जहाँ केवल जीव-हत्या करने
की चेतना थी।
- इस तरह समझ लेने पर अहिंसा के बौद्ध सिद्धांत में कहीं कोई भ्रम नहीं
पड़ता।
- यह एक पूर्णतया निर्दोष या नैतिक सिद्धांत है, जिसका प्रत्येक को आदर करना
चाहिये।
- निस्सन्देह उन्होंने निर्णय लेने का दायित्व व्यक्ति पर ही छोड़ दिया है कि क्या
जीव-हत्या करने की आवश्यकता है या नहीं। व्यक्ति के अतिरिक्त किस पर
यह दायित्व छोड़ा जा सकता है? मनुष्य के पास प्रज्ञा है और उसे उसका प्रयोग
करना चाहिये।
- एक नैतिक मनुष्य पर उचित बिन्दु पर विभाजक रेखा खींचने का विश्वास किया
जा सकता है।
ब्राह्मणवाद में ‘जीव-हत्या करने की चेतना’ है।
जैन-धर्म में कभी भी जीव-हत्या न करने की चेतना है।
भगवान बुद्ध ही अहिंसा उनके मध्यम वर्ग के अनुरूप है।
इसे दूसरे शब्दों में कहा जाये तो बुद्ध ने सिद्धांत (शील) और नियम (विनय)
के मध्य एक भेद किया है। उन्होंने अहिंसा को नियम नहीं बनाया है। उन्होंने
इसे एक सिद्धांत या जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित किया है। 23. इसमें निस्सन्देह उन्होंने अत्यंत बुद्धिमता से कार्य किया है।
- एक सिद्धांत (शील) तुम्हें कार्य करने की स्वतन्त्रता देता है, एक नियम नहीं।
नियम या तो तुम्हें तोड़ देता है या तुम नियम को तोड़ देते हो।