6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
वह गृहस्थ जीवन में रहा तो वह चक्रवर्ती राजा होगा और अगर वह गृहत्याग
कर सन्यासी बन गया तो वह संसार के अंधकार को दूर करने वाला बुद्ध
बनेगा।’’
- पात्र में तेल धारण किए रहने की तरह महामाया बोधिसत्त्व को दस महीने तक
अपने गर्भ में धारण किए रही। जब उसके प्रसव के दिन निकट आए, तो प्रसव
के लिए उसे अपने मायके जाने की इच्छा हुई। अपने पति से उसने कहा-‘‘मैं
अपने मायके देवदह जाना चाहती हूं।’’
- ‘‘तुम जानती हो कि तुम्हारी इच्छाएं पूरी की जाएंगी,’’ शुद्धोदन ने उत्तर दिया।
सुनहरी पालकी में बिठाकर अनेक सेवकों के साथ महामाया को उसके मायके
भिजवा दिया गया।
- देवदह जाने के मार्ग में महामाया को शाल व अन्य वृक्षों के एक सुन्दर उपवन
से गुजरना था, जिनमें कुछ पुष्पित थे कुछ अपुष्पित, यह लुम्बिनी वन के नाम
से जाना जाता था।
- पालकी लुम्बिनी वन से गुजर रही थी, संपूर्ण लुम्बिनी वन किसी दिव्य चित्रलता
उपवन या किसी प्रतापी नरेश के लिए सजाया हुआ भोज-मंडल जैसा प्रतीत
हो रहा था।
- सभी वृक्ष पूर्णतः फलों और फूलों से लदे थे। वृक्षों पर रंग-बिरंगे भंवरे विचित्र
आवाजें कर रहे थे और अनेक प्रकार के पक्षी मधुर राग आलाप रहे थे।
- इस मनोरम दृश्य को देखकर महामाया को वहां थोड़ी देर रुककर मनोविनोद
करने की इच्छा उत्पन्न हुई। उसने अपने पालकी वाहकों को उसे शाल उपवन
ले जाने तथा वहां प्रतीक्षा करने को कहा।
- पालकी से उतरकर महामाया एक सुंदर शाल वृक्ष तक पैदल गई। मनमोहक
मंद-मंद पवन बह रही थी और वृक्षों की शाखाएं ऊपर-नीचे हिल रही थीं।
महामाया की इच्छा उनमें से एक को पकड़ने की हुई।
- संयोग से एक शाखा इतनी झुक गई कि वह उसे पकड़ सके। तुरन्त शाखा
ऊपर उठ गई और उसका हल्का-सा झटका लगने से उसे प्रसव-वेदना आरम्भ
हो गई। शाल-वृक्ष की शाखा को पकड़े, खड़े ही खड़े महामाया ने पुत्र को
जन्म दिया।
- 563 ई.पू. वैशाख पूणि्र्ामा के दिन बालक का जन्म हुआ। महामाया ने पंजों के
बल खड़ी होकर उसे पकड़ लिया।