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- शुद्धोदन और महामाया के विवाह को हुए बहुत समय बीत गया था, परन्तु
उन्हें कोई संतान नहीं हुई थी। आखिर जब उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, तो उसका
जन्मोत्सव न केवल शुद्धोदन, बल्कि उसके परिवार और सभी शाक्यों द्वारा खूब
धूम-धाम और प्रसन्नतापूर्वक मनाया गया।
- बालक के जन्म के समय कपिलवस्तु के शासक (राजा) बनने की बारी शुद्धोदन
की थी। इस प्रकार, उस समय उसे राजा की उपाधि धारण करने की खुशी
मिली। स्वाभाविक रूप से बालक को राजकुमार कहा गया।
4. असित का आगमन
- जिस समय बालक का जन्म हुआ उस समय हिमालय पर्वत पर असित देवल
नाम के एक बड़े ऋषि रहते थे।
- असित ने सुना कि आकाश में देवता ‘बुद्ध’ शब्द पुकार रहे हैं और उसकी
पुनरावृत्ति कर रहे हैं। उसने देखा कि वे अपने वस्त्रों को लहराकर प्रसन्नतापूर्वक
इधर-उधर घूम रहे हैं। उसने सोचा कि मैं उस जगह क्यों न जाऊं, जहां ‘बुद्ध’
ने जन्म लिया है।
- संपूर्ण जम्बुद्वीप पर दिव्य चक्षु से अवलोकन करने पर असित ऋषि ने देखा
कि शुद्धोदन के घर एक दिव्य बालक का जन्म हुआ है और अपनी प्रभा से
प्रकाशमान हो रहा था उसके जब असित ऋषि ने जन्म पर ही सारे देवतागण
रोमांचित हो रहे हैं।
- इसलिए महान ऋषि असित अपने भांजे नरदत्त के साथ राजा शुद्धोदन के निवास
स्थान पर आए। राजमहल के दरवाजे पर खड़े हो गए थे।
- तब असित ऋषि ने देखा कि शुद्धोदन के द्वार पर लाखों आदमी एकत्रित हुए
हैं। इसलिए वह द्वारपाल के पास गए और बोले-‘‘हे द्वारपाल!, राजा को जाकर
सूचित करो कि दरवाजे पर एक ऋषि खड़े हैं।’’
- तब द्वारपाल राजा के समीप गया और हाथ जोड़कर कहने लगा-‘‘राजन! एक
वृद्ध ऋषि आए हुए हैं, जो द्वार पर खड़े हैं और आप से भेंट करना चाहते
हैं।’’
- राजा ने असित के लिए एक आसन की व्यवस्था की और द्वारपाल से कहा-‘‘ऋषि
को अंदर आने दो।’’ बाहर निकलकर द्वारपाल ने असित से कहा-‘‘कृपया अंदर
पधारें।’’