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लेकिन इसके लिये एक कसौटी है जो विद्यमान है।
यदि कुछ भी पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है, तो वह है यदि वे
विवेकपूर्ण नहीं थे, यदि वे तार्कित नहीं थे, तो वे कुछ नहीं थे। अतः कुछ भी
समान हो जो विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है, वह बुद्ध-वचन के रूप में स्वीकार
किया जा सकता है।
- दूसरी बात यह है कि भगवान बुद्ध ने कभी भी ऐसी चर्चा में पड़ने की कोशिश
नहीं की थी, जो मनुष्य के कल्याण के लिये लाभदायक नहीं थी। अतः कोई
भी बात जो बुद्ध पर आरोपित की गयी है, किन्तु जिसका मनुष्य के कल्याण
से सम्बन्ध नहीं है, वह बुद्ध-वचन के रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती
है।
- एक तीसर कसौटी भी है कि भगवान बुद्ध ने सभी विषयों को दो वर्गों में
विभाजित किया है। वे जिनके बारे में वे निश्चित थे और वे जिनके बारे में वे
निश्चित नहीं थे। उन विषयों पर जो पहले वर्ग में आते हैं, उन्होंने अपने विचार
निश्चित और निर्णायक रूप से व्यक्त किये थे। उन विषयों पर जो दूसरे वर्ग में
आते हैं, उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये हैं, किन्तु वे केवल सुझाव के रूप
में व्यक्त किये गये विचार हैं।
- तीन प्रश्नों के विषय में चर्चा करने में जिनके विषय में सन्देह और मतभेद है,
यह निश्चित करने से पहले कि इन पर भगवान बुद्ध का क्या विचार था, उक्त
परीक्षणों को ध्यान में रखना आवश्यक है।