1. शुभ-कर्म, अशुभ-कर्म और पाप - Page 354

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1. शुभ-कर्म अशुभ-कर्म और पाप

  1. शुभ कर्म करो। अशुभ कर्म में सहयोग न दो। कोई पाप-कर्म न करो।

  2. यह बौद्ध जीवन-मार्ग है।

  3. यदि एक मनुष्य शुभ कार्य करता है, तो उसे पुनः, पुनः करना चाहिये। उसी

में चित्त लगाना चाहिये। शुभ कार्यों का संचय सुखद होता है। 4. शुभ कर्म के विषय में यह मत सोचो कि ‘‘यह मेरे पास तक नहीं आयेगा।’’

बूँद-बूँद पानी से घड़ा भरता है। ऐसे ही थोड़ा-थोड़ा संचय से ही शुभ कर्म

बढ़ते हैं।

  1. जिस काम को करके आदमी को पछताना न पड़े और जिसके फल को आनन्द और

सन्तोष के साथ प्राप्त किया जा सके, उस कार्य को करना बहुत अच्छा होता है। 6. जिस काम को करके मनुष्य को पछताना न पड़े और जिसके फल को प्रफुल्लित

मन से भोग सके, उस काम को करना अच्छा है।

  1. यदि मनुष्य शुभ कार्य करे, तो उसे वह शुभ कार्य पुनः, पुनः करना चाहिये।

उसे उसमें आनन्दित होना चाहिये। शुभ कर्म का संचय आनन्ददायक होता है। 8. यहाँ तक कि भले मनुष्य को भी बुरे दिन देखने पड़ते हैं, जब तक कि उसके

शुभ कर्म फलित नहीं हो जाते। किन्तु जब उसके शुभ कर्म फलित होने लगते

हैं, तब भला मनुष्य अच्छे दिन देखता है।

  1. शुभ-कर्म के विषय में किसी को अपने मन में यह नहीं सोचना चाहिए कि

इसका फल मेरे पास तक नहीं आयेगा। यहाँ तक कि पानी की बूँद-बूँद गिरने

से भी घड़ा भर जाता है। इसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य शुभ-कर्मों को थोड़ा-थोड़ा

एकत्रित करके भलाई में परिपूर्ण हो जाता है।

  1. शील सदाचार की सुगंध चंदन या धूप या कमल या चमेली की सुगंध से

बढ़कर होती है।

  1. धूप और चन्दन की सुगंध कुछ ही दूर तक जाती है, किन्तु शील की सुगंध

बहुत दूर-दूर तक जाती है।

  1. अशुभ-कर्म के बारे में कहते हुए यह न सोचे कि यह मुझ तक नहीं पहुँच

पायेगा। जिस प्रकार बूँद-बूँद करके पानी से घड़ा भरा जाता है, उसी प्रकार

थोड़ा-थोड़ा करके अशुभ कर्म भी बहुत बढ़ जाते हैं।

  1. कोई ऐसा कार्य करना अच्छा नहीं है, जिसको करने से पछतावा हो और जिसका

फल आँसुओं और विलाप के साथ भोगना पड़े।