1. शुभ-कर्म, अशुभ-कर्म और पाप - Page 355

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. यदि कोई मनुष्य बुरे मन से बोलता या कार्य करता है, तो दुख उसका पीछा

उसी प्रकार करता है, जैसे गाड़ी के पहिए गाड़ी खींचने वाले पशु के पैरों का

करता है।

  1. दुष्कर्म का अनुसरण न करे। प्रमाद में न रहे। मिथ्या-दृष्टि में न पड़े।
  2. शुभ-कर्मों में अप्रमादी हो सभी बुरे विचारों का दमन करे। जो कोई भी

शुभ-कर्म करने में पिछड़ा है, उसका मन अशुभ-कर्मों में लगता है। 17. जिसको करने के बाद पछताना पड़े, वह कार्य करना अच्छा नहीं है। उसके

फल को आँसुओं और विलाप के साथ भोगना पड़ता है।

  1. अशुभ-कर्म करने वाला भी तब तक सुखी रहता है, जब तक कि उसके अशुभ

कर्म फलित नहीं हो जाते हैं। किन्तु जब उसके अशुभ-कर्म फलित हो जाते

हैं, तब अशुभ-कर्म करने वाला दुख भोगता है।

  1. अशुभ-कर्म के विषय में किसी को अपने मन में यह कहते हुए नहीं सोचना

चाहिये कि, ‘यह मेरे पास तक नहीं आयेगा।’ पानी की बूँद-बूँद गिरने से घड़ा

भर जाता है। इसी प्रकार अशुभ कर्मों को थोड़ा-थोड़ा करके मूर्ख पाप से परिपूर्ण

हो जाता है।

  1. मनुष्य को शुभ-कर्म करने में शीघ्रता करनी चाहिये, और अपने मन को बुराई

से दूर करना चाहिये। यदि मनुष्य शुभ-कर्म करने में सुस्ती करता है तो उसका

मन अशुभ-कर्मों में लिप्त हो जाता है।

  1. यदि एक मनुष्य पाप करता है, तो उसे वह बार-बार नहीं करना चाहिये। उसे

उसमें आनन्दित नहीं होना चाहिये, क्योंकि बुराई का संचय दुखदायी होता है। 22. शील के नियमों का पालन करो। पाप का पालन मत करो। शीलवान ही इस

संसार में सुखपूर्वक रहता है।

  1. कामुकता से दुख उत्पन्न होता है। कामुकता से भय उत्पन्न होता है। जो कामुकता

से पूर्णतया मुक्त है, उसके लिए न तो शोक है और न ही भय है। 24. भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़ा दुख है। इसको यथार्थ में समझ

लेने पर निर्वाण सर्वोच्च सुख बन जाता है।

  1. स्वयं-कृत, स्वयं-उत्पन्न तथा स्वयं-पोषित अशुभ-कर्म करने वाले को ऐसे पीस

डालता है, जैसे बज्र मूल्यावान रत्न को तोड़ देता है।

  1. जो अत्यनत दुःशील होता है, वह स्वयं को उस स्थिति में पहुंचा देता है जहाँ

उसका शत्रु उसे चाहता है। ठीक वैसे ही जैसे कि एक अम्बर-बेल उस पेड़

को जिसे वह घेरे रहती है।