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  1. बुरे और अहितकर कर्मों को करना सरल है, किन्तु हितकर और शुभ कर्मों का

करना कठिन है।

2. लोभ और तृष्णा

  1. न लोभ और न तृष्णा के वशीभूत हों।

  2. यह बौद्ध जीवन-मार्ग है।

  3. धन की वर्षा होने से भी मनुष्य की इच्छाओं की सन्तुष्टि नहीं होती है। बुद्धिमान

मनुष्य भली-भांति जानता है कि इच्छायें अल्प-स्वाद और दुखद होती हैं। 4. जो सम्यक सम्बुद्ध का शिष्य है? उसे दिव्य-काम-भोगों के सुखों में भी कोई

आनन्द नहीं प्राप्त होता है। उसका आनन्द तो तृष्णा के क्षय में होता है। 5. तृष्णा से दुख उत्पन्न होता है, तृष्णा से भय उत्पन्न होता है। उसके लिये जो

तृष्णा से पूर्णतया मुक्त हो, उसे न तो दुख है और न भय ही है। 6. लोभ से दुख उत्पन्न होता है, लोभ से भय उत्पन्न होता है। उसके लिये जो

लोभ से पूर्णतया मुक्त है, उसे न तो दुख है और न भय ही है। 7. वह जो स्वयं को मिथ्याभिमान के सुपुर्द कर देता है, वह जीवन के यथार्थ

उद्देश्य को भूल कर काम-भोगों का लोभ करता है, वह अन्त में ध्यानी की

ओर ईर्ष्या भरी दृष्टि से देखता है।

  1. कोई मनुष्य किसी भी वस्तु के प्रति आसक्त न हो, इसकी हानि दुखदायी होती

है। जिन्हें किसी से न प्रेम है और किसी से न घृणा है, वे बंधनमुक्त हैं। 9. काम-भोगों से दुख पैदा होता है, काम-भोगों से भय पैदा होता है, वह जो

काम-भोगों से मुक्त है, उसे न तो दुख है और न भय ही है। 10. आसक्ति से दुख पैदा होता है, आसक्ति से भय पैदा होता है, वह जो आसक्ति

से मुक्त है, उसे न तो दुख है और न भय ही है।

  1. राग से दुख पैदा होता है, राग से भय पैदा होता है, वह जो राग से मुक्त है,

उसे न तो दुख है और न भय ही है।

  1. लोभ से दुख पैदा होता है, लोभ से भय पैदा होता है, वह जो लोभ से मुक्त

है, उसे न तो दुख है और न भय ही है।

  1. वह जो शील और प्रज्ञा से सम्पन्न हैं, जो न्यायी है, सत्यवादी है और जो अपने

कर्त्तव्य को पूरा करता है, उसे संसार प्रिय मानता है।

  1. जो मनुष्य बहुत चिरकाल के बाद दूर-दराज से सुरक्षित लौटता है उसके रिश्तेदार,

मित्र और प्रियजन उसका अभिनन्दन करते हैं।