328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- इसी प्रकार जिसने शुभ-कर्म किये हैं, और जो इस संसार से चल बसा है,
जैसे रिश्तेदार, मित्र के लौटने पर स्वागत करते हैं, उसी प्रकार उसके शुभ-कर्म
उसका स्वागत करते हैं।
3. क्लेश और द्वेष
किसी को क्लेश मत दो, किसी से द्वेष मत रखो।
यह बौद्ध जीवन-मार्ग है।
क्या सम्पूर्ण संसार में कोई मनुष्य इतना निर्दोष है कि उसे दोष देने का अवसर
नहीं दिया जा सकता, जैसे कि एक तेजस्वी घोड़ा चाबुक की मार का कोई
अवसर नहीं देता है।
- तुम श्रद्धा शील, वीर्य, समाधि, धर्म-विजय (सत्य की खोज), ज्ञान और आचरण
की पूर्णता तथा स्मृति द्वारा इस महान् दुख का अंत कर दो। 5. तपों में सबसे बड़ा तप क्षमा है, तथा निर्वाण सबसे बड़ा सुख है, ऐसा बुद्ध
कहते हैं। जो दूसरों को क्लेश दे वह प्रव्रजित नहीं है। जो दूसरों को कष्ट
पहुंचाने के कार्य करे वह श्रमण नहीं है।
- वाणी से बुरे वचन न बोलना, किसी को कोई कष्ट न देना, विनयपूर्वक संयम
का अभ्यास करना, यही बुद्ध की देशना है।
न जीव-हिंसा करो, और न जीव-हिंसा कराओ।
अपने लिये सुख चाहने वाला, दूसरे सुख चाहने वाले प्राणियों को न कष्ट देता
है या न जीव-हिंसा ही करता है, वही सुख को प्राप्त कर सकेगा। 9. यदि, कांसे के टूटे बर्तन की तरह तुम निशब्द हो जाओ, तो तुम निर्वाण तक
पहुँच गये जानो, तुम्हारा क्रोध से कोई संबंध नहीं है।
- जो निर्दोष और अहानिकर लोगों को कष्ट पहुँचाता है, वह स्वयं शीघ्र ही दुख
भोगता है।
- जो कोई उत्तम परिधान से अलंकृत ब्रह्मचारी, शान्त है, दीक्षित है, संयमित है,
ब्रह्मचारी है और जिसने अन्य सभी प्राणियों का छिद्रान्वेषण करना त्याग दिया
है, वह निस्संदेह एक श्रमण, एक भिक्षु है।
- क्या इस संसार में कोई मनुष्य लज्जा से इतना संयमित है कि वह निन्दा द्वारा
उत्तेजित नहीं होता है, जैसे एक कुलीन घोड़ा चाबुक से?
- यदि कोई मनुष्य किसी अहानिकार, शुद्ध और निर्दोष व्यक्ति को ठेस पहुँचाता