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है, तो बुराई उसी मूर्ख पर वापस आ पड़ती है, जैसे हवा के विरुद्ध फेंकी हुई
धूल फेंकने वाले पर ही वापस आ पड़ती है।
4. क्रोध और शत्रुता
- क्रोध मत करो। अपने शत्रुता को भूल जाओ। प्रेम द्वारा अपने शत्रुओं को जीत
लो।
यह बौद्ध जीवन-मार्ग है।
क्रोधाग्नि शान्त होनी ही चाहिये।
वह जो यह विचार मन में रखता है कि उसने मुझे गाली दी, उसने मेरे साथ
दुर्व्यवहार किया, उसने मुझे पराजित किया, उसने मुझे लूट लिया, उसका वैर
कभी शान्त नहीं होता।
- वह जो ऐसे विचार मन में नहीं रखता, उसका वैर शान्त हो जाता है।
- शत्रु, शत्रु के साथ बुराई करता है, घृणा करने वाला घृणा करने वाले के साथ,
लेकिन यह बुराई किसकी होती है?
- मनुष्य को चाहिए कि प्रेम द्वारा क्रोध को जीते, भलाई से बुराई को जीते, दान
से लोभी को जीते।
- सत्य बोले, क्रोध न करें, मांगने वाले को थोड़ा होने पर भी दे।
- एक मनुष्य को चाहिए कि क्रोध का त्याग कर दे, गर्व का परित्याग कर दे,
सभी बंधनों पर काबू पा ले, जो नाम रूप में आसक्त नहीं है और जो किसी
अन्य व्यक्ति की चीज को अपनी नहीं समझता, उस आदमी को कोई कष्ट
नहीं होता।
- वह जो चढ़ते क्रोध को एक चलते रथ के समान रोक लेता है, उसे ही मैं
(जीवन-रथ का) सच्चा सारथी मानता हूँ, दूसरे लोग तो केवल लगाम पकड़ने
वाले ही हैं।
- विजय वैर उत्पन्न करती है, पराजित आदमी दुखी रहता है। शान्त व्यक्ति जय
और पराजय की चिन्ता छोड़कर सुखी रहता है।
- कामाग्नि के समान कोई अग्नि नहीं। घृणा के समान कोई दुर्भाव नहीं है।
उपादान-स्कन्धों के समान कोई दुख नहीं है, निर्वाण से बढ़कर कोई सुख नहीं
है।
- वैर से वैर कभी भी शान्त नहीं होता। वैर अवैर से ही शान्त होता है। यही सदा
का नियम है।