330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
5. मनुष्य, मन और मन का मैल
- मनुष्य वही कुछ होता है, जो उसका मन उसे बना देता है।
- सन्मार्ग पर आगे के लिये मन की साधना, धर्मपरायणता का पथ, पहला चरण
है।
यह बौद्ध जीवन-मार्ग की मुख्य शिक्षा है।
प्रत्येक चीज में मन ही प्रमुख तत्त्व है और मन ही मुख्य है।
यदि कोई मनुष्य दुष्ट मन से कुछ बोलता है या करता है, तो दुःख उसका
पीछा उसी प्रकार करता है, जैसे गाड़ी के पहिये गाड़ी खींचने वाले पशु के
पैरों के पीछे-पीछे करते हैं।
- यदि कोई मनुष्य मन की सच्चाई से बोलता है या कार्य करता है, तो सुख
उसका उसी प्रकार पीछा करता है, जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली परछाई
आदमी के पीछे-पीछे।
- इस चंचल, अस्थिर, दुःरक्ष्य दुःनिवार्य मन को बुद्धिमान मनुष्य ऐसे ही सीधा
करता है, जैसे बाण बनाने वाला बाण को सीधा करता है।
- जिस प्रकार पानी से बाहर जमीन पर फेंकी हुई मछली तड़फती है उसी प्रकार
मन मार के बंधन से मुक्त होने के लिए तड़फड़ाता है।
- जिसे नियंत्रण में रखना कठिन है, जो अस्थिर है, जो सदैव सुख की खोज में
लगा रहता है, ऐसे मन को वश में रखना ही अच्छा है। वश में रखा हुआ मन
ही सुख देने वाला होता है।
- अपने आप को एक प्रदीप (द्वीप) बनाओ, परिश्रम करो। जब तुम्हारे चित्त मलों
का नाश हो जाये और तुम दोष से मुक्त हो जाओ, तो तुम वांछित लोक में
प्रवेश कर जाओगे।
- जैसे एक सुनार, एक-एक करके, थोड़ा-थोड़ा करके, मैल को दूर करता है,
उसी प्रकार बुद्धिमान आदमी को चाहिए कि क्षण-क्षण करके, थोड़ा-थोड़ा कर
अपने चित्त के मैल को दूर कर दे।
- जिस प्रकार लोहे से उत्पन्न हुआ मोर्चा, लोहे को खा जाता है, उसी प्रकार
पापी अपने दुष्कर्म उसे दुर्गति तक ले जाते हैं।
- किन्तु सभी मलों की अपेक्षा निकृष्ट एक दोष है। अविद्या सबसे बड़ा मल है।
हे भिक्षुओ! इस दोष को दूर कर निर्दोष बन जाओ।
- एक ऐसे मनुष्य का जीवन जीना सरल है, जो एक कौवे के समान निर्लज्ज है,