8. चित्त की सतर्कता और एकाग्रता - Page 365

336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. यदि किसी मनुष्य को कोई विवेकपूर्ण एवं बुद्धिमान साथी नहीं मिलता, जो

उसके साथ चले और मर्यादित जीवन व्यतीत कर_ तो वह अकेला ही एक

राजा की तरह जिसने अपने विजित देश को पीछे छोड़ दिया है, जंगल में एक

हाथी की तरह विचरण करे।

  1. अकेले रहना अच्छा है, मूर्ख आदमी की संगति अच्छी नहीं। मनुष्य अकेला रहे,

कोई पाप कर्म न करे, थोड़ी इच्छाओं वाले एक जंगली हाथी की तरह विचरण

करे।

  1. काम का समय पड़ने पर मित्रों का होना सुखकर है, सकारण आनन्द सुखकर

है, सकारण शुभ-कर्म को करना सुखकर है, मृत्यु की घड़ी में शुभ-कर्मों का

होना सुखकर है, सभी दुखों का त्याग करना सुखकर है।

  1. संसार में मातृत्व सुखकर है, पितृत्व सुखकर है, श्रमणत्व सुखकर है।
  2. वृद्धावस्था तक स्थायी शील सुखकर है, दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित श्रद्धा सुखकर है,

प्रज्ञा की प्राप्ति सुखकर है, पापों से बचना सुखकर है।

  1. वह जो मूर्खों की संगति में चलता है, दीर्घकाल तक कष्ट पाता है। मूर्खों की

संगति शत्रु की संगति के समान सदैव दुखद है। बुद्धिमान की संगति रिश्तेदारों

के साथ मिलन के समान सुखकर है।

  1. इसलिये, मनुष्य को बुद्धिमान, प्रज्ञावान, शिक्षित, क्षमाशील, कर्त्तव्यनिष्ठ और

श्रेष्ठ का अनुसरण करना चाहिये, मनुष्य को ऐसे भले और बुद्धिमान मनुष्य का

अनुसरण करना चाहिये, जैसे चन्द्रमा नक्षक्ष पथ का अनुसरण करता है। 40. न प्रमाद और न ही काम-भोगों का आनन्द का अनुसरण करें। जो अप्रमादी है,

वही विपुल सुख प्राप्त करता है।

  1. जब शिक्षित मनुष्य अप्रमाद द्वारा प्रमाद को दूर कर देता है, तो वह बुद्धिमान

मनुष्य, प्रज्ञा की सीढ़ीनुमा ऊँचाइयों पर चढ़कर शोक से मुक्त हो, शोकग्रस्त

मूर्ख जनता की ओर नीचे ऐसे देखता है, जैसे पर्वत पर खड़ा हुआ उन लोगों

की ओर नीचे देखता है, जो समतल पर नीचे खड़े होते हैं। 42. प्रमादियों के बीच अप्रमादी, सोये हुओं के बीच जागरूक, बुद्धिमान मनुष्य

मरियल टट्टू को पीछे छोड़ते हुए शानदार घोड़े के समान आगे बढ़ जाता है।

8. चित्त की सतर्कता और एकाग्रता

  1. प्रत्येक कार्य में सतर्क रहो, प्रत्येक कार्य में एकाग्र रहो, सभी कार्य में अप्रमादी

और निडर रहो।