8. चित्त की सतर्कता और एकाग्रता - Page 366

337

  1. यही बौद्ध जीवन-मार्ग है।

  2. हम जो कुछ हैं, ये सब कुछ हमारे विचारों का परिणाम है। यह हमारे विचारों

पर ही आधारित है, यह हमारे विचारों से ही निर्मित है। यदि मनुष्य बुरे विचार

के साथ बोलता है या कर्म करता है, तो दुख उसका अनुसरण करता है। यदि

मनुष्य अच्छे विचार के साथ बोलता है या अच्छा कर्म करता है तो सुख उसका

अनुसरण करता है। इसलिये शुद्ध विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

  1. विचारहीन मत बनो, विचारवान बनो। स्वयं को बुरे मार्ग से बाहर निकालो, जैसे

दलदल में फंसा एक हाथी निकलता है।

  1. बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए वह अपने चित्त की रक्षा करे, क्योंकि उसको

समझना कठिन है। वह अत्यन्त चतुर है और वह जब जहाँ चाहे झट चल देता

है। सुरक्षित चित्त सुखदायक होता है।

  1. जिस प्रकार ठीक से न छाई छत में वर्षा का पानी घुस जाता है, उसी तरह

साधनाविहीन चित्त में राग घुस जाता है।

  1. जिस प्रकार भली-भाँति छायी हुई छत में वर्षा का पानी घुस नहीं पाता, उसी

प्रकार एक साधनायुक्त चित्त में भी राग नहीं घुस पाता।

  1. यह मेरा चित्त पहले जैसा चाहता था, जिधर वह जाना चाहता था, उधर चला

जाता था_ किन्तु अब मैं इसे ठीक से वैसे ही नियन्त्रित रखूँगा, जैसे कि महावत

अंकुश के माध्यम से मस्त हाथी को नियंत्रण में रखता है।

  1. जहाँ चाहे वहाँ जाने वाले चित्त को साधना अच्छा है, जिसे कड़ाई से नियन्त्रण

में रखना कठिन है, किन्तु सधा हुआ चित्त सुखदायक होता है। 10. जो इन दूरगामी अपने चित्त को नियन्त्रण में रखेंगे, वे मार (कामराग) के बंधनों

से मुक्त रहेंगे।

  1. यदि मनुष्य का चित्त अस्थिर है, यदि वह सच्चे धम्म को नहीं जानता, यदि

उसका चित्त शांत नहीं है, तो उसकी प्रज्ञा कभी भी पूर्णता को प्राप्त नहीं

होगी।

  1. एक द्वेषी अपने द्वेषी, या एक शत्रु अपने शत्रु के साथ जितनी हानि कर सकता

है, गलत रास्ते पर लगा हुआ चित्त अपेक्षाकृत अधिक हानि पहुँचा सकता है। 13. हमारा जितना अधिक हित ठीक मार्ग पर लगा श्रेष्ठ चित्त कर सकता है, उतना

माता-पिता या दूसरे रिश्तेदार भी नहीं कर सकते।