10. दुख, सुख तथा दान और करुणा - Page 367

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

9. सावधानी, अप्रमाद और निर्भीकता

  1. जब बुद्धिमान मनुष्य प्रमाद को अप्रमाद से दूर कर देता है, तब वह शोक रहित

हो शोकाकुल प्रज्ञा को प्रज्ञारूपी प्रसाद पर चढ़कर ऐसे देखता है जैसे कोई

पर्वत शिखर पर चढ़ा हुआ बुद्धिमान आदमी नीचे तलहटी में खड़े हुए मूर्खों

को देखता है।

  1. प्रमादियों के मध्य अप्रमादी, सोए हुओं के मध्य जागरूक उसी प्रकार पीछे

छोड़कर चला जाता है, जैसे शीघ्रगामी अश्व एक दुर्बल अश्च को पीछे छोड़

जाता है।

  1. स्वयं को प्रमाद में मत फंसाओ। काम-भोगों में मत फंसो। अप्रमादी ही ध्यान

लाभ करता है।

  1. अप्रमाद अमृत पद है, वह वहाँ ले जाता है जहाँ मृत्यु नहीं। प्रमादी मृत्यु का

मार्ग है। वे जो अप्रमाद में लगे रहते हैं, नहीं मरते, किन्तु प्रमादी पहले से ही

मरे के समान होते हैं।

  1. किसी दूसरे बड़े हित के लिए अपने उद्देश्य से दूर मत जाओ। जब एक बार

तुमने अपना लक्ष्य देख लिया हो, तो उसे दृढ़तापूर्वक और मजबूती से पकड़े

रहो

  1. सावधान रहो! प्रमाद को दूर करो! सत्पथ पर चलो! जो कोई उस पर चलता

है, वह संसार में सुख से जीवन व्यतीत करता है।

  1. प्रमाद एक कलंक है_ सतत् प्रमाद एक काला धब्बा है। निरन्तर प्रयास द्वारा

और प्रज्ञा की सहायता से तुम्हें प्रमाद रूपी विषैले वाण को बाहर निकाल देना

चाहिये।

  1. स्वयं को प्रमाद में मत फंसाओ। काम-भोगों में मत फंसो अप्रमादी ही ध्यान

लाभ करता है और असीम सुख प्राप्त करता है।

  1. यदि एक गंभीर मनुष्य ने स्वयं को अप्रमादी बना लिया है, यदि वह विस्मरणशील्

नहीं है, यदि उसके कर्म शुद्ध हैं, यदि वह विवेक सहित कार्य करता है, यदि

वह स्वयं को संयमित रखता है और धम्म के अनुसार जीवन व्यतीत करता है,

उसका यश बढ़ता है।

10. दुख, सुख तथा दान और करुणा

  1. दरिद्रता दुख को बढ़ावा देती है।