10. दुख, सुख तथा दान और करुणा - Page 368

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  1. किन्तु यह आवश्य नहीं कि दरिद्रता दूर होने से आदमी सुखी भी हो जाये।
  2. जीवन का उच्च-स्तर नहीं, बल्कि आचरण का उच्च-स्तर ही है, जो सुख को

बढ़ावा देता है।

  1. यही बौद्ध जीवन-मार्ग है।

  2. भूख सबसे बड़ा रोग है।

  3. आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सर्वश्रेष्ठ धन है। विश्वास सर्वश्रेष्ठ रिश्तेदार

है, निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।

  1. वैरियों के बीच में भी अवैरी बनकर निस्संदेह सुखपूर्वक जीवन सीखना

चाहिए।

  1. रोगों से मुक्त रहते हुए, हमें रोगी मनुष्यों के मध्य निस्संदेह सुखपूर्वक जीना

सीखना चाहिये।

  1. लोभियों के मध्य लोभ से मुक्त रहते हुए, हमें निस्संदेह सुखपूर्वक जीना सीखना

चाहिए।

  1. जैसे खेत खर-पतबार द्वारा बरबाद होता है, ठीक वैसे ही मनुष्य मात्र काम-राग

द्वारा बरबाद होता है, इसलिए काम-राग रहित लोगों को दिया गया दान महान

फलदायी होता है।

  1. जैसे खेत खर-पतवार द्वारा बरबाद होता है, ठीक वैसे ही मनुष्य मात्र प्रमाद से

मुक्त है, महान फलदायी होता है।

  1. जैसे खेत खर-पतवार द्वारा बरबाद होता है, ठीक वैसे ही मनुष्य तृष्णा द्वारा

बरबाद होता है, इसलिए उन लोगों को दिया गया दान, जो तृष्णा से मुक्त है,

महान फलदायी होता है।

  1. ‘धम्म’ का दान सब दानों से बढ़कर है। ‘धम्म’ का माधुर्य सब माधुर्यों से

बढ़कर है। ‘धम्म’ का आनन्द सब आनन्दों से बढ़कर है।

  1. विजय से द्वेष उत्पन्न होता है, क्योंकि पराजित दुखी रहता है। वह जिसने विजय

और पराजय दोनों का त्याग कर दिया है, वह संतोष से सुखी रहता है। 15. राग के समान कोई अग्नि नहीं, घृणा के समान कोई पराजय नहीं, इस शरीर

के समान कोई दुख (का कारण) नहीं, शान्ति से बढ़कर कोई सुख नहीं है। 16. दूसरों की कमियों की ओर और दूसरों के कृत्याकृत्य को मत देखो, अपनी

कमियों या कृत्याकृत की ओर देखो।

  1. जो विनम्र, जो शुद्धि-गंवेषक, जो अनासक्त, जो एकान्त अभिलाषी, जो पवित्र