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धर्म विराग है, सर्वश्रेष्ठ मनुष्य वह है, जो चक्षुमान (बुद्ध) है। 7. यह ही एक मार्ग है, कोई दूसरा मार्ग नहीं है, जो प्रज्ञा की विशुद्धि की ओर
ले जाता है। इसी मार्ग पर चलो।
- यदि तुम इस मार्ग पर चलोगे, तो तुम दुख का अन्त कर सकोगे। जीवन में मैंने
दुखदायी कांटों को निकालने का जब यह मार्ग समझ लिया था तभी मेरे द्वारा
उपदेशित किया गया था।
- तुम्हें स्वयं ही प्रयास करना होगा। तथागत तो केवल पथ-प्रदर्शक हैं।
- ‘सभी संस्कार अनित्य हैं।’ जब प्रज्ञा की आंख से देखता है तो दुख से मुक्ति
मिल जाती है।
- ‘सभी धर्म अकाल, हैं’, जब कोई यह प्रज्ञा से देखता है, वह दुख से मुक्ति
प्राप्त कर लेता है।
- जब वह उन्नति करने के समय स्वयं को क्रियाशील नहीं करता, जो युवा और
शक्तिशाली होने पर भी आलस्य से परिपूर्ण है, जिसकी संकल्प-शक्ति और
विचार दुर्बल है, ऐसा आलसी और सुस्त मनुष्य कभी भी प्रज्ञावान नहीं हो
सकता।
- अपनी वाणी पर नजर रखते हुए, मन से भली-भाँति संयत, एक मनुष्य को
अपने शरीर से कभी कोई बुरा कर्म नहीं करने देना चाहिये। मनुष्य यदि केवल
इन तीन कर्म-पंथों को निर्मल रखे, तो वह उस मार्ग को प्राप्त कर लेगा जो
तथागत द्वारा सिखाया गया है।
- यद्यपि वास्तविक ज्ञान लाभ है, ज्ञान का अभाव हानि है, मनुष्य इस दोहरे लाभ
और हानि के मार्ग को जानकर अपने को ऐसे मार्ग में लगाये कि ज्ञान वृद्धि
हो सके।
- अपने ही हाथों से एक शरद्कालीन कमल की भाँति आत्म-प्रेम को काट डालो।
शान्ति के पथ को हृदय में संजोए रखो। सुगत द्वारा उपदिष्ट शान्ति-मार्ग निर्वाण
का आश्रय लो।
- अधम्म का अनुसरण मत करो! विचारहीनता में मत जियो! मिथ्या सिद्धान्त का
अनुसरण मत करो!
- स्वयं को क्रियाशील करो! प्रमाद मत करो! शील के नियम का अनुसरण करो!
शीलवान ही संसार में सुखी रहता है।
- जो पहले भले ही प्रमादी रहा हो, किंतु बाद में वह संयमी बनकर बादलों से
मुक्त चन्द्रमा की तरह इस संसार को प्रकाशित कर देता है।