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- शुद्धोदन ने असित ऋषि को सिसकियां भरकर रोते और आंसू बहाते हुए
देखा।
- ऋषि को इस प्रकार रोता हुआ देखकर शुद्धोदन के रोंगटे खड़े हो गए और
दुःखी होकर असित से कहा-‘‘हे ऋषिवर! आप क्यों रो रहे हैं? क्यों आंसू
बहा रहे हैं और क्यों इतनी गहरी सिसकियां भर रहे हैं? भविष्य में बालक के
लिए कोई अशुभ तो नहीं है?’’
- इस पर असित ऋषि ने राजा से कहा-‘‘राजन्!’’ मैं बालक के लिए नहीं रो रहा
हूं। उसको तो भविष्य विल्कुल निर्विघ्न है, लेकिन मैं अपने लिए रो रहा हूं।’’
- ‘‘लेकिन ऐसा क्यों?’’ शुद्धोदन ने पूछा। असित ऋषि ने उत्तर दिया-‘‘मैं वयोवृद्ध
हूं, मेरी बहुत आयु हो गई है और यह बालक निश्चित रूप से बुद्ध बनेगा,
परम और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करेगा, उसके बाद यह धम्म चक्र प्रवर्तन करेगा, जिसे
पहले किसी ने नहीं किया। तदनंतर संसार की खुशी और लोककल्याण के लिए
‘सुधम्म’ का उपदेश करेगा।’’
- ‘‘जिस श्रेष्ठ जीवन की, जिस सद्धर्म की वह घोषणा करेगा वह आदि में
कल्याणकारक मध्य में कल्याणकारक और अंत में कल्याणकारक होगा। वह
अर्थ और भाव से निर्दोष और पूर्ण होगा। वह परिपूर्ण और परिशुद्ध होगा।’’
- ‘‘जिस प्रकार उदुम्बर (गूलर) का फूल कभी-कभी किसी स्थान पर उगता
है, उसी प्रकार कभी-कभी किसी स्थान पर, अनंत युगों के बाद इस संसार
में सम्यक् सम्बुद्ध बुद्ध की उत्पत्ति होती है। इसलिए, हे राजन्! निश्चित रूप
से यह बालक महा ज्ञान प्राप्त बुद्धत्वप्राप्त करेगा, सम्यक् सम्बुद्ध होगा, फिर
अनंत जीवों पर दया करके दुःख के सागर से पार कर सुख की अवस्था में
ले जाएगा।’’
- ‘‘लेकिन मैं उस बुद्ध को नहीं देख सकूंगा, इसलिए राजन! मैं रो रहा हूं, दुःख
में मैं जोर से सिसकियां भर रहा हूं। मैं बुद्ध की पूजा नहीं कर पाऊंगा।’’
- तब राजा ने महान ऋषि असित और उसके भांजे नरदत्त को अनुकूल भोजन
कराया, उन्हें वस्त्र-दान देकर, उनकी परिक्रमा कर वंदना की।
- तब असित ऋषि ने अपने भांजे नरदत्त से कहा, ‘‘जब कभी तुम सुनो कि यह
बालक सम्यकसम्बुद्ध हो गया है, तब उसके शिक्षण में शरण ग्रहण करना। यह
तुम्हारे सुख, कल्याण और प्रसन्नता के लिए होगा।’’ इतना कहने के पश्चात्
असित ने राजा से विदा ली और अपने आश्रम को चले गए।