3. सर्वश्रेष्ठ मनुष्य - Page 380

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  1. ‘‘कोई-कोई मनुष्य ऐसा होता है जो न पूछे जाने की बात क्या कहें, पूछे जाने

पर भी स्वयं अपने अवगुणों को प्रकट नहीं करता। निस्संदेह पूछे जाने पर और

बार-बार प्रश्न किए जाने पर, वह स्वयं अपने अवगुणों को कहता है, ऐसा

मनुष्य एक दुष्ट मनुष्य होता है।’’

  1. ‘‘तत्पश्चात् पुनः भिक्षुओ! एक ऐसा मनुष्य है, जो पूछे जाने की बात क्या कहें

बिना पूछे ही अपने अच्छे गुणों को प्रकट करता है। भिक्षुओ! पूछे जाने पर और

बार-बार प्रश्न किए जाने पर वह बिना ढके या छिपाये और पूर्ण विवरण देते

हुए स्वयं अपने अच्छे गुणों को कहता है। भिक्षुओ! ऐसा मनुष्य भी एक दुष्ट

मनुष्य होता है।’’

3. सर्वश्रेष्ठ मनुष्य

  1. चारिका करते समय तथागत ने अपनी सामान्य आदत के अनुसार साथ चल रहे

भिक्खुओं को निम्नलिखित उपदेश दियाः

  1. भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए तथागत ने कहा, ‘‘भिक्षुओ! इस संसार में चार

प्रकार के लोग पाये जाते हैं।’’

  1. ‘‘(1) वह जिसने न तो अपने कल्याण के लिये प्रयास किया और न ही किसी

दूसरे के लिये। (2) वह जिसने दूसरों के कल्याण के लिये प्रयास किया, किन्तु

अपने लिये नहीं। (3) वह जिसने अपने कल्याण के लिए प्रयास किया, किन्तु

दूसरों के लिए नहीं। (4) वह जिसने अपने और दूसरों के कल्याण के लिये

प्रयास किया।’’

  1. ‘‘वह जिसने न तो अपने कल्याण के लिये प्रयास किया और न ही किसी दूसरे

के लिये किया, वह श्मशान की लकड़ी की तरह है, जो दोनों सिरों से जलती

हुई, और मध्य से गोबर से पुती हुई है। वह न तो गाँव में और न ही जंगल में

जलावन के काम आती है। वह संसार कि लिये अनुपयोगी है और अपने लिये

भी अनुपयोगी है।’’

  1. ‘‘जिसने अपनी हानि करके दूसरों के कल्याण के लिये प्रयास किया है, वह

दोनों में श्रेष्ठ और उत्कृष्ट दोनों ही है।’’

  1. ‘‘लेकिन भिक्षुओ! जिसने अपने कल्याण के लिये और दूसरों के कल्याण के

लिये प्रयास किया है, इन चारों व्यक्तियों में से वही सर्वश्रेष्ठ, प्रमुख, सर्वोच्च,

उच्चतम और सर्वोत्तम है।’’