352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
4. प्रबुद्ध मनुष्य
- एक समय तथागत उक्कट्ठ और सेतब्बय नामक दो नगरों के मध्य महापरि
पर पहुंचे थे। उसी समय द्रोण नामक ब्राह्मण भी उक्कट्ठ और सेतब्बय नामक
दो नगरों के मध्य महापथ पर भी पहुंचे थे।
- उस समय तथागत ने सड़क छोड़ दी और एक वृक्ष के नीचे पद्मासन लगाकर
बैठ गये। तब द्रोण ब्राह्मण भी तथागत के पदचिन्हों पर चलते हुए वहाँ जा
पहुँचा तथा तथागत उस वृक्ष के नीचे देदीप्यमान और एक मनोरम रूप में
संयतेन्द्रिय, एकाग्रचित नियंत्रित, शक्तिशाली और शान्त मुद्रा में बैठे थे। यह
देख द्रोण ब्राह्मण तथागत के पास पहुंचा।
- पास जाकर वह उनसे इस प्रकार बोलाः
‘‘क्या आदरणीय आप एक देवता तो नहीं हैं?’’
‘‘ब्राह्मण, मैं निस्सन्देह एक देवता नहीं हूँ।’’
‘‘क्या आदरणीय आप एक गन्धर्व तो नहीं हैं?’’
‘‘ब्राह्मण, मैं निस्सन्देह गन्धर्व नहीं हूँ।’’
‘‘क्या आदरणीय आप तब एक यक्ष तो नहीं हैं?’’
‘‘ब्राह्मण, मैं निस्सन्देह यक्ष नहीं हूँ।’’
‘‘क्या आदरणीय आप तब एक सामान्य मनुष्य तो नहीं हैं?’’
‘‘ब्राह्मण, मैं निस्सन्देह एक सामान्य मनुष्य नहीं हूँ।’’
- तथागत का इस प्रकार का उत्तर सुनकर द्रोण ब्राह्मण ने कहाः ‘‘जब आपसे
पूछा गयाः क्या आप एक देवता हैं? आपने कहाः ‘नहीं’।
‘‘जब आपसे पूछा गयाः क्या आप एक गन्धर्व हैं? आपने कहा नहीं।
‘‘जब आपसे पूछा गयाः क्या आप एक यक्ष हैं? आपने कहाः नहीं।
‘‘जब आपसे प्रश्न किया गयाः क्या आप तब एक सामान्य मनुष्य हैं?
आपने कहा नहीं? आप आदरणीय तब क्या हो सकते हैं?’’ 5. ‘‘ब्राह्मण, वस्तुतः मैं एक देवता, एक गन्धर्व, एक यक्ष और एक सामान्य मनुष्य
था, जब तक कि मैंने स्वयं को आसवों से शुद्ध नहीं कर लिया। इन्हीं आस्रवों से
अब मैं मुक्त हो गया हूँ, ये एक कटे हुए ताड़ वृक्ष के समान हो गये हैं, अपने
आधार के नष्ट होने के बाद अब इनकी पुररुत्पत्ति की सम्भावना नहीं है।’’