5. न्यायी और सज्जन मनुष्य - Page 382

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  1. ‘‘जैसे कि एक कमल या एक कुमुदिनी पानी में उत्पन्न होते हैं, पानी में बढ़ते

हैं, पानी से ऊपर निकल आते हैं, फिर भी पानी से अछूते बनकर रहते हैं, उसी

प्रकार हे ब्राह्मण! संसार में जन्म लेने पर भी, संसार में बढ़ने पर भी, संसार

को जीत लेने के बाद अब मैं संसार से अछूता बन गया हूँ।’’ 7. ‘‘इसलिये, हे ब्राह्मण! अब तुम मुझको प्रबुद्ध मनुष्य (बुद्ध) जानो।’’

5. न्यायी और सज्जन मनुष्य

  1. भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए तथागत ने कहा, ‘‘मनुष्यों के चार वर्ग हैं। यदि

तुम जानना चाहते हो कि कौन सज्जन और न्यायी मनुष्य है, तो तुम्हें उनकी

पहचान करना सीखना चाहिए।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! मनुष्यों का एक वर्ग ऐसा है, जो अपने कल्याण के लिये प्रयास

करता है, किन्तु दूसरों के लिए नहीं।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! इसमें एक मनुष्य अपने भीतर के कामच्छन्द के उन्मूलन का अभ्यास

करता है, किन्तु दूसरों के भीतर के कामच्छन्द के उन्मूलन को प्रेरित नहीं

करता। अपने भीतर के व्यापाद के उन्मूलन का अभ्यास करता है, किन्तु दूसरों

के भीतर के व्यापाद के उन्मूलन को प्रेरित नहीं करता है। और साथ ही अपने

भीतर की अविद्या के उन्मूलन का अभ्यास करता है किन्तु दूसरों के भीतर की

अविद्या के उन्मूलन को प्रेरित नहीं करता है।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! निःसंदेह, यह ऐसा मनुष्य है, जो अपना कल्याण करने का प्रयास

करता है, किन्तु दूसरों के कल्याण का नहीं।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! मनुष्यों का एक वर्ग ऐसा है, जिसने दूसरों के कल्याण के लिये

प्रयास किया है, किन्तु अपने लिये नहीं।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! इसमें एक मनुष्य अपने भीतर के कामच्छन्द, व्यापाद और अविद्या

के उन्मूलन के लिये ही अभ्यास नहीं करता, बल्कि दूसरों के भीतर कामच्छन्द

व्यापाद और अविद्या के उन्मूलन को प्रेरित करता है।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! निस्सन्देह यह मनुष्य ऐसा है, जिसने दूसरों के कल्याण के लिये

प्रयास किया है, किन्तु अपने लिये नहीं।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! मनुष्य का एक वर्ग ऐसा है जो न तो स्वयं अपने कल्याण के लिये

और न ही दूसरों के कल्याण के लिये प्रयास करता है।’’