354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘भिक्षुओ! इसमें एक मनुष्य न तो अपने भीतर कामच्छन्द, व्यापाद और अविद्या
के उन्मूलन का अभ्यास करता है और न ही दूसरों के भीतर कामच्छन्द, व्यापाद
और अविद्या के उन्मूलन को प्रेरित करता है।’’
- ‘‘भिक्षुओ! यह मनुष्य ऐसा है, जिसने न तो स्वयं अपने कल्याण के लिये प्रयास
किया है और न दूसरों के कल्याण के लिये।’’
- ‘‘भिक्षुओ! मनुष्यों का एक वर्ग ऐसा है, जो स्वयं अपने कल्याण के लिये
प्रयास करता है और साथ ही साथ दूसरों के कल्याण के लिये भी।’’ 12. ‘‘भिक्षुओ! इसमें मनुष्य अपने भीतर कामच्छन्द, व्यापाद और अविद्या के उन्मूलन
का अभ्यास करता है और साथ ही साथ दूसरों के भीतर कामच्छन्द, व्यापाद
और अविद्या के उन्मूलन को प्रेरित करता है।’’
- ‘‘भिक्षुओं! यह मनुष्य ऐसा है, जिसने स्वयं अपने कल्याण के लिये प्रयास
किया है और साथ ही साथ दूसरों के कल्याण के लिये भी।’’ 14. ‘‘यह अन्तिम मनुष्य ही न्यायी और सज्जन माना जाना चाहिये।’’
6. शुभ-कर्म करने की आवश्यकता
एक अवसर पर तथागत भिक्खुओं से इस प्रकार बोलेः
‘‘भिक्षुओ! कुशल-कर्मों को करने से मत डरो। यह जो ‘कुशल-कर्म’ शब्द
है, यह एक प्रकार के ‘सुख’ का या जिसकी हम इच्छा करते हैं उसका या
जो कुछ हमको प्रिय है उसका, अथवा जो कुछ हमें आनन्दप्रद है उसका ही
पर्याय है। भिक्खुओ! मैं स्वयं साक्षी हूँ कि मैंने चिरकाल तक कुशल-कर्मों के
इच्छित, रुचिकर, प्रिय और आनन्दप्रद फल का उपभोग किया है।’’ 3. ‘‘मैं प्रायः अपने आप से पूछता हूँ, ‘यह सब किन कुशल-कर्मों का परिणाम
हैं? किन कुशल-कर्मों का फल है कि जिनमें मैं अब इस प्रकार सुखी और
संतुष्ट हूँ।’’
- उत्तर जो मिलता है वह यह हैः ‘‘तीन कुशल-कर्मों का यह परिणाम है। तीन
कुशल-कर्म - दान, शील और सयंम।’’
- ‘‘वह मंगल घड़ी है, यह घड़ी उत्सव मनाने की घड़ी है, यह घड़ी आनन्द
मनाने की घड़ी है और घड़ी मंगलमय-समय है, मनोरम दिन, सुहावना समय
है, जब दान देने वाले लोगों को दान दिया जाता है। जब शुभ-कर्म, शुभ-वचन
तथा शुभ-विचार के परिणामस्वरूप इनका अभ्यास करने वालों को शुभ-फल