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की प्राप्ति होती है।’’
- ‘‘धन्य हैं, वे जिन्हें ऐसे लाभ की प्राप्ति होती है और जिन्हें इस समृद्धि की
प्राप्ति होती है। इस प्रकार तुम भी अपने सगे संबंधियों सहित निरोगी और सुखी
रहते हुए सत्पथ की समृद्धियों को प्राप्त करो।’’
7. शुभ संकल्प करने की आवश्यकता
- एक बार श्रावस्ती के जेतवन में विहार करते समय तथागत ने भिक्खुओं से
कहाः
- ‘‘भिक्षुओ! पवित्र और सुखी जीवन व्यतीत करने के लिये शुभ संकल्पों को
करने और उनका पालन करने की अत्यन्त आवश्यकता है। ’’ 3. ‘‘मैं तुम्हें बताऊँगा कि तुम्हारे संकल्प क्या होने चाहिये।’’
- ‘‘संकल्प होना चाहिए कि मैं जीवनपर्यन्त अपने माता-पिता की सहायता करूँगा।
मैं अपने वंश के मुखिया का आदर करूँगा। मैं मधुर-भाषी बनकर रहूँगा। मैं
किसी के विषय में बुरा नहीं बोलूँगा। स्वार्थपरता के कलंक से अपने हृदय को
शुद्ध कर, मैं शुद्ध-हाथों से दानशील होकर रहूँगा, दान देने में आनन्द प्राप्त
करते हुए मैं घर में निवास करूंगा। जो कुछ मुझे प्राप्त होगा, उसमें से दूसरे
उचित मांगने वालों को भी देकर ग्रहण करूंगा।’’
- ‘‘अपने पूरे जीवन-पर्यन्त, मैं क्रोधरहित रहूँगा और यदि क्रोध उत्पन्न होगा, तो
मैं शीघ्रता से उसे नियन्त्रित करूँगा।’’
- ‘‘हे भिक्षुओ! ये सात संकल्प हैं, जिनको अपने मन में जगह देने से और जिनके
अनुसार आचरण करने से तुम सुख और पवित्रता की अवस्था को प्राप्त कर
सकोगे।’’